शनिवार, 6 जुलाई 2013

दोहों पर दोहों का अवशेष




सात रंग, ढंग से भरें, इंद्र धनुष हो  जाय |
सतसैया से गठन से, काव्य अमर हो जाय |

चारों भागों में भरें, चाहे रंग अनेक |
उचित एक भरना लगे, भरदें केवल एक |

अगर कभी मन में उठें, सुंदर सुगढ़ विचार |
बिन विलम्ब लिख डालिए, उनका सुगमित सार |

मन सबका दोहा रचे, लिखता जाय शरीर |
काल-जयी होगा तभी, डालें मन की पीर |

उर्दू भाषा में बना, दोहा मक़ता शेर |
हिंदी कविता है गजल, हुआ समय का फेर |

सागर से गागर भरे, ले सागर से सीप |
रस की छोटी बूंद से, मोती रचे प्रदीप |

चार वाक्य और चार पद, लक्ष भेद में दक्ष |
कभी भाव स्पष्ट कर, प्रश्न बनादे यक्ष ?

सागर सा गहरा अतल, सागर सा विस्तीर्ण |
सागर सा रस पूर्ण है, है हर विधा प्रवीण |

थन दोहे को मानकर, दुहा जाय जब भाव |
अक्षर-अक्षर छोड़ता, मन पर अमिट प्रभाव |

दोहे की देहावली, जितनी सुगठित होय |
मन पर तीखे वार को, उतनी सक्षम होय |

जिस कवि ने दोहे लिखे, हुआ काव्य में दक्ष |
तुलसी जैसे सैकड़ों, उदाहरण प्रत्यक्ष |

अनगिन छंदों से बढ़ी, कविता की समृद्धि |
पा दोहा सर्वोच्च पद, बढा रहा श्री-वृद्धि  |

काव्य विधा में छंद जो, स्वयं पूर्ण है 'राज' |


दोहा इनमे आज भी, छंदों का  सरताज |

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