शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

दोहावली





स्वर्ण कलश द्वै आपके,अमृत विष ज्यों साथ |

अमृत शैशव पा रहा, विष प्रियतम के हाथ |


अहंकार  सुख  में   नहीं,  दुर्दिन में हो धीर |

यही ध्यान रख जो चलें,कभी न भोगें पीर |


निर्मल-निश्छल आंख में,स्वपनों का परिलेख |

कालजयी हो जाएगा, इन  का   हर अभिलेख |  


शब्द चित्र रचते मगर,शब्द-जाल से दूर |     

शब्दों में शब्दान्वित,निहित अर्थ भरपूर |


एक चतुष्पदी भी -

उतर गहराई में मन की,अचेतन कल्पना है ये | 

कहें कविता इसे कैसे,विरल परि-कल्पना है ये |


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