सोमवार, 22 जुलाई 2013

उत्तराखण्ड-विनाश पर कुछ दोहे



बोतल में गंगा भरी, बुझी न अनबुझ प्यास |
नदियों को झीलें बना,अदभुत किया  विकास ||

खण्ड-खण्ड पर्वत किये, खीँच-खीँच कर खाल |
कब्रगाह घाटी बनी,  होकर झील    विशाल ||

मन्दिर पूरा बच गया, बची नहीं टकसाल |
बना शिवालय क्षेत्र सब, शव-आलय बेहाल ||

यह थी केवल बानगी, आगे क्या हो खेल |
अफसर-नेता स्वार्थ का, जारी रहा जो खेल ||

उड़ मंडराते फिर रहे, गद्दी के सब गिद्ध |
मलबे में बिखरे पड़े, मुर्दा-निर्धन, सिद्ध ||

वन-नदियाँ गिरवीं रखीं, बेचे सभी पहाड़ |
स्वार्थ हेतु अब बंद हो, पर्वत से खिलवाड़ ||

दानपात्र को तोडकर, बिन कुछ शर्म-मलाल |
ढोंगी साधू ले उड़े, मुद्रा, भूषण -  माल ||

खोली शिव ने एक लट, बही धार विकराल |
पूर्ण जटा जो खोलते, होता तब क्या हाल ||

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