मंगलवार, 23 जुलाई 2013

श्रेष्ठ रूबाई हो ?



'सतसईया' का दोहा हो या,  'पदमावत'चौपाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
      केश-कज्जली ,छवि कुन्दन सी,
      चन्दन जैसी   गंध   लिये |
           देवलोक    से     पोर-पोर में,
           भर    लाई   क्या  छंद प्रिये | 
 चक्षुचकोर,चन्द्रमुख चंचल,चन्दनवन से आई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
           रक्त - कपोल ,   नासिका तीखी, 
      अधर  पगे, मधु    प्याले से |
           क्षण-क्षण मुस्कानों से पूरित-,
      मृग-नयना ,   मतवाले    से |
मदमाती,मदमस्त,मुखर सी,मस्त-मस्त अंगडाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की, सबसे  श्रेष्ठ रुबाई हो ?
      देह-कलश  से बरस    रही है, 
          यौवन   की   रसधार    प्रिये  |
      पुष्प - लता सी  स्वर्ण-देह में,
          घुंघरू   सी   झनकार   प्रिये |
मलयागिरि से चली मस्त हो,  मंद वही पुरवाई हो ?        या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
             मेरे लिये सुमुखि आई हो ?,
        धरती पर  नव-छन्द लिए |
            महक रहा  जो  मधुर गंध  से,
            अमृत-घट  निज  संग  लिए |
सप्त-लोक के सप्त-सुरों की , सतरंगी  -  शहनाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

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