शनिवार, 20 जुलाई 2013

टीस मन की सनसनाई




छू गई पुर वा जरा सा,      टीस   मन  की  सनसनाई |
आस मन में प्रिय मिलन की,सिर छुपाकर गुनगुनाई |
         बस चुकी हो तुम नयन में,
         प्रीत बनकर , नेह बनकर |
         ढेर सपने हैं   पलक  पर ,        
         चांदनी रातों में  सज कर |
प्यास अधरों पर मिलन की,फिर उभर कर आज आई |
छू गई पुर वा जरा सा,        टीस   मन  की  सनसनाई |
         छा रहा उन्माद पल-पल,
         वेदना की टीस तज कर |
         चाहता है साथ प्रिय का,
         फिर समा जाना परस्पर |
भर चुका सुधियों से आंगन,प्यार की झालर लजाई |
छू गई पुर वा जरा सा,    टीस   मन  की  सनसनाई |
         प्यार की सौगात लेकर,आ-
         भी जाओ, मत सताओ |
         भूल कर संसार को अब-
         पाश में  मेरे   समाओ |
है सभी संसार नश्व्वर,      जो घड़ी बीती   न    आई |
छू गई पुर वा जरा सा,   टीस   मन  की  सनसनाई |

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