बुधवार, 10 जुलाई 2013

रिश्तों पर कुछ और दोहे





दरकीं  रिश्तेदारियां,   नाते  सब विद्रूप  |
स्वारथ ने बांटी सुबह, मुट्टी-मुट्ठी धुप ||
-०-
बदल  गईं  गर्माहटे,  ठंडे  मन के मेल |
सहमी प्रीत निभा रही, सम्बन्धों के खेल ||
-०-
रिश्ते  छोटे  हो  गए, बड़ी हो गई नाक |
रिश्ते को अब प्रीत ने, देदीं तीन तलाक ||
-०-
किया  समर्पण  प्रीत ने,  नहीं  लगाई देर |
स्वारथ जी को चुन लिया,यही समय का फेर ||
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बल-विहीन रिश्ते हुए, चल कर सीधी चाल  |
स्वारथ जी मुखिया बने, कर के कई बवाल ||
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प्रीति-रीति दुर्बल हुई, भौतिकता मजबूत |
सन्तति नौकर पालते, भूत बांटते पूत ||
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रिश्ते  निर्धन  हो  गए, प्रीत गई है रीत |
स्वारथ जी मोटे हुए, चल कुचक्र की नीति ||
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निर्बल रिश्ते मांगते,  सम्बन्धों  की भीख |
हर बस्ती बहरी बनी, सुनकर उनकी चीख ||
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टूटे  रिश्ते  हेरते,  उगते  लाल   गुलाब |
किस मरुथल में जा छिपे,रिश्तों के सैलाब ||
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रिश्ता हर उलझा मिला, तोड़ प्रीत की डोर |
नातों की चादर मिली, स्वार्थ-पुरम में भोर ||
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टूट गए सम्बन्ध सब, बिखरी प्रीत नकोर |
नाते सारे चल पड़े ,  स्वार्थ-रत्न की  ओर ||
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रिश्ते छोटे हो गए, स्वार्थ बने अब उच्च |
अंकल जी के सामने, चाचा जी हैं तुच्छ ||
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पश्चिम के इनलाज ने, ठोकी ऐसी कील |
धीरे - धीरे बुझ गई, रिश्तों की कंदील ||
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इस इनला ने कर दिए, रिश्ते सब बरबाद |
सही समझने पूछते,  साला है दामाद ||
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कजिन शब्द ने देश के, रिश्ते किये तमाम |
रिश्तेदारी के सभी,  शब्द किए  बदनाम ||
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मौसा,फूफा,ताऊ को, अंकल जी अब लील |
भारत की संस्कृति में, करा रहे गुड फील ||

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