बुधवार, 31 जुलाई 2013

गाथा हिंदुस्तान की



 गाथा हिन्दुस्तान की 
घटती बढती महिमा  सबकी, घटी नहीं बेईमान की |
सतयुग,त्रेता,कलियुग सबमें,-सदा चली बेईमान की |
देवभूमि   भगवान  की,-
ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

गांधी जी का शिष्य सड़क पर,-अब भी धक्के खाए,
फूट डाल कर राज कर रहा,-नेता   माल  उड़ाए |
ऐसी - तैसी  करता  रहता,- पूरे   हिन्दुस्तान की,
काम नरक जाने के लेकिन,-इच्छा स्वर्ग-विहान की |
देवभूमि भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

एन.जी.ओ.को बना माध्यम,- खाता   'माल मलीदा',
कागज में अनुदान बांटना,- इसका धन्धा  सीधा |
गिद्धों जैसे गटक रहे हैं,- बोटी  हिन्दुस्तान   की,
अपने हित में भेंट चढाते,-भारत के सम्मान की |
देवभूमि भगवान  की,- 
ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

वोट खरीदो, शासक बन कर,-भूलो पांच बरस को,
जनता खोजे, खोज न पाए,-तरसे रोज दरस  को |
डोर हाथ में रक्खो अपने,-चेयर-मैन,  परधान की |
टैक्स  लगा कर  माल  उड़ाना,- परम्परा शैतान की |
देवभूमि  भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

मंहगा राशन बेच रहा है,-खुले  आम क्यों  लाला,
सुबह-शाम मन्दिर में जाकर,-फेर रहा क्यों माला |
जीवन-दायी दवा ब्लैक में,-पूजा किस प्रतिमान की,
कुत्तों से भी बदतर  हालत,-लगती  है इन्सान की |
देवभूमि   भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |


माल  मिलावट  वाला बेचे,-कल्लू - मल  हलवाई,
इंस्पैक्टर क्यों पकड़े उसको,-चखता रोज   मलाई |
अधिक मछलियां गन्दी मिलतीं,इस तालाब महान की,
वेतन  बढता  भ्रष्टजनों  का,-यात्रा  बढे  विमान की |
देवभूमि  भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

सरेआम  बाला  को  घर से,-गुण्डा हर ले  जाए, 
पीड़ितजन पर मित्र पुलिस ही,- गुण्डा-एक्ट लगाए |
कुम्भकरण जैसी हो जाए,-दशा 'पुलिस बलवान' की, 
गुण्डे,  नेता रहें  सुरक्षित,-कीमत कब 'इन्सान' की |
देवभूमि  भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

महिला-कालेज की सड़्कों पर,-बिकतीं  गुप्त किताबें,
ठेके लेकर कोचिंग वाले,- इच्छित चयन  करा दें |
निज  शिष्या से इश्क लड़ाए,-हुई  सोच विद्वान की,
प्रोटेक्शन पा जाए कोर्ट से,-'लक' मजनूं  संतान की |
देवभूमि  भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

रोज  पार्क में जवां दिलों की,-होती  लुक्का-छिप्पी,
सुबह - सवेरे   स्वच्छ्क  बीने,-एफ.एल.,माला-टिक्की |
बीस रूपये में आंख बन्द हो,चीफ-गार्ड मलखान की,
देख  दुर्दशा भी  शरमाए,-दुर्गत  हुई  विधान की |
देवभूमि  भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

ग्राम- प्रधान हुई है जब से,- घीसू      की  घर वाली,
सरजू - दूबे बैठे घर में,-किस विधि  चले  दलाली |
हर अनुदान स्वंय खाजाता,-चिन्ता किसे  विधान की,
अपना हुक्म चलाता घीसू,-चलती  नहीं प्रधान की |
देवभूमि   भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

बिन रिश्वत के काम करें क्यों,-बाबू   या    पटवारी,
मोटी-मोटी रिश्वत  खाते,-लगभग सब अधिकारी |
हक  बनती  जाती है  रिश्वत,-भारत देश महान की,
स्वीसबैंक में रखें ब्लैक सब,हर धरती भगवान की |
देवभूमि   भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की |

काम - चोर,  रिश्वत-खोरों की,-तनखा बढती  जाती,
रोटी और लंगोटी जन की,-छोटी     होती   जाती |
अन्धी  पीसे कुत्ते खाएं,   हालत  देश  महान  की ,
खिल्ली उड़ा रहे हैं मिलकर,जनता  के कल्याण की |
देवभूमि   भगवान  की,-
 ये गाथा  हिन्दुस्तान की | 

***

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

बापू तुम वापस आ जाओ



राष्ट्र-पिताजी आप स्वर्ग में,परियों के संग खेल रहे हैं |
इधर आपके , चेले-चांटे ,अरब-खरब में खेल रहे हैं |

बचे-खुचे अनुगामी जितने,जीवन अपना ठेल रहे  हैं |
फटी लंगोटी तन पर लेकर,मंहगाई को  झेल रहे  हैं |

भारत से सम्बन्धित बापू,गणित तुम्हारा सही नहीं था |
कुछ दिन रहता सैन्यतंत्र में,प्रजातंत्र के योग्य नहीं था |

नियमों में पलने की आदत,खाद बना कर डाली जाती |
फिर नेता की फसल उगाकर,प्रजातंत्र में डाली  जाती |

आज सभी को है आजादी,लुटती-फिरती जनता सारी |
मक्खन खाते नेता अफसर,छाछ न पाती किस्मत मारी |

मंहगाई से त्रस्त सभी  हैं,गायब माल नहीं दिखता है |
दाल मिल रही सौ की केजी,आटा तीस रूपये मिलता है |

आलू तीस रूपये तक चढकर,अब नीचे कुछ आ पाया है |
प्याज बिक रही इतनी मंहगी,तड़का तक ना लग पाया है |

बड़ी कम्पनी माल घटा कर,कीमत पूरी ले  लेती  है |
अधिकारी  धृतराष्ट्र  बनाए-,कुछ जूठन उनको देती है |

कर्ज उठाते, नोट   छापते,धन जब जेबों में आता  है |
पैसा ज्यादा,माल अगर कम,मूल्य एकदम बढ जाता  है |

अर्थ-शास्त्री पी.एम. अपने,इतना फण्डा समझ न पाते |
भारत ला कर,एफ.डी.आई,वे विकास का चित्र दिखाते |

धीरे-धीरे देश सिमट  कर-,उन के बन्धन में आया है |
भारत मां को बंधक रखकर,नेता  शर्म   नहीं खाया है |

बेच रहे हैं देश कुतर  कर,अपनी सत्ता  कायम  रखने |
धर्म जाति में नफरत  डालें,मन में दूरी  कायम  करने |

बापू इस स्वतंत्र दिवस पर,तुम लाठी ले वापस आओ |
ठोक पीट कर नेता अफसर,प्रजातंत्र  पटरी पर  लाओ | 
***

सोमवार, 29 जुलाई 2013

अस्लियत-ए-ख़लीफ़ा



ख़लीफ़ा घर से बाहर जो, हमें बन कर दिखाता है |
वही  चूहा  बना घर में, चरण  'उनके'  दबाता है |

सुबह की चाय से लेकर, बनाता लंच घर भर का,
धुलाई कर के कपड़ों की, वही छत पर सुखाता है |

वही स्कूल जाने  को करे  तैयार,  बच्चों   को,
वो जब अंगड़ाई लेती हैं,तो उनकी चाय लाता है |

चला जाता है शापिंग साथ में, चपरासियों सा ये,
यही पेमेन्ट करता है, यही सब लाद  लाता  है |

वो नज़रें कर ज़रा टेढी,   इसे  आवाज  देती  हैं,
तो अन्दरतक ख़लीफ़ा ये,सिहर कर कांप जाता है |

सुनाऊं क्या ख़लीफ़ा की, ये हैं सब 'राज' की बातें ,
बना रहता गधा घर में,अकड़ बाहर दिखाता  है | 

शनिवार, 27 जुलाई 2013

क्या बन्दर थे हनुमान -


                            
           एक नगर या गांव में एक से लेकर सैकड़ों तक बने हनुमान मन्दिरों 
में स्थापित हनुमान जी की मूर्तियों में सजे हनुमान जी के स्वरूप ने इस प्रश्न को
यक्ष प्रश्न बनाकर रख दिया है कि हनुमान जी अपने वास्तविक रामायण पात्र रूप में 
क्या थे?| क्या वे एक बन्दर थे?,क्या वे एक आदि मानव थे? या फिर वे वास्तव में 
एक अतीव शक्तियों से सम्पन्न एक विद्वान मनुष्य ही थे ?| बाल्मीकि रामायण की 
अलंकारिक कवित्त भाषा ने एक अतीन्द्रीय मानव को बानर (वन में रहने वाला) से 
बन्दर का ऐसा स्वरूप प्रदान कर दिया जो राम चरित मानस तक आते-आते हिन्दुओं 
की कल्पनाशक्ति से बन्दर की मूर्ति में बदल कर जगह-जगह मन्दिरों मे स्थापित हो
कर रह गया | अगर आप तर्क और प्रमाण सामने रख कर भी किसी हनुमान भक्त से
यह विश्वास करने के लिये कहें कि हनुमान जी बन्दर नहीं बानर जाति या जनजाति
के मनुष्य थे तो वह किसी भी दशा में मानने को तैयार नहीं होगा और हो सकता है
कि उसके धार्मिक विश्वास को पहुंच रही ठेस उसे उत्तेजित भी कर दे | ऐसा नहीं है कि
इस गंभीरविषय पर किसी ने गंभीरतापूर्वक विचार न किया हो | अनेक विद्वानों ने इस
प्रश्न पर विचार और मनन किया है | कुछ ने हनुमान जी को और उनकी वानरजाति
को पौराणिक काल्पनिक जाति माना और बाल्मीकि ने जो वानर जातिके कार्यकलापों 
का वर्णन किया है उसे 'निरर्थक विचित्रताओं का ब्यौरा मात्र' कहा है | कुछ अन्य ने 
उन्हें मात्र बन्दर मान कर कोई विशेष महत्व न दिये जानेपर जोर दिया है | किन्तु
वानर सभ्यता का जो सजीव विवरण 'रामायण' में है वह इन दोनों  मान्यताओं को
गलत सिद्ध करने के पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करता है | देखा जाय तो रामायण के पात्रों
में सबसे सक्रिय भूमिका में हनुमान ही दिखाई देते हैं | एक बार परिदृष्य में आकर 
वे अंत तक कोई न कोई सक्रिय भूमिका निभाते मिलते हैं | एक समर्पित प्रकाण्ड - 
विद्वान,बलशाली अतीन्द्रीय सर्वगुण सम्पन्न सेवक के रूपमें उनके कार्यकलाप सह्सा
विश्वास करनेको तैयार नहीं होने देते कि, वे काल्पनिक चरित्र हैं,कोई आदिमानव या
अतीन्द्रीयबन्दर भी हो सकते हैं | शाब्दिकअर्थ का एक ऐसा अनर्थ जो वनचारी,वनजीवी
विद्वान, वीरवर हनुमान को बन्दर बना कर रख दे | गले नहीं उतरता | अगर हनुमान 
बन्दर थे तो सीता को खोज लेने के उपरान्त  पीठ पर बिठा ले जाने का प्रस्ताव करते 
हैं तो सीताजी परपुरूषस्पर्श का पाप ढोने से अच्छा नर्क में रहना क्यों पसन्द करतीं | 
यह हनुमान जी के मानव होने का प्रबल साक्ष्य नहीं है ?  रामायण में राक्षसों के बाद 
बानर जाति का सवसे अधिक उल्लेख हुआ है | वह भी दक्षिण भारत की एक अनार्य
जाति ही थी किन्तु इस जाति ने राम के विरोध के स्थान पर राक्षसों से आर्यों के युद्ध 
में राम का साथ दिया सिर्फ यहीनहीं उन्होंने तो पूर्व से ही आर्यसंस्कृति के  आचरण
स्वीकार कर रखे थे | बाली से रावण का युद्ध और बाली-सुग्रीव के क्रियाकलाप तथा 
तत्कालीन बानर राज्यकी बाल्मीकि द्वारा प्रदर्शित परिस्थितियों से यह दर्पण के समान 
स्पष्ट हो जाता है | वास्तविकता यह है कि विंध्यपर्वत के दक्षिण में घने वनों मॅं 
निवास करने वाली जनजाति थी बानर | वे बनचर थे इस लिये वानर कहे गये या
फिर उनकी मुखाकृति वानरों से मिलती जुलती थी अथवा अपने चंचल स्वभाव के -
कारण इन्हें वानर कहा गया या फिर इनके पीछे लगी पूंछ के कारण(इस पर आगे - 
चर्चा करेंगे)ये बानर कहलाए | यह इतिहास के गर्भ में है | केवल नामकरण के ही
आधार पर बन्दर मान लेना उचित नहीं होगा | इस सम्बन्ध में केवल एक उदाहरण 
ही पर्याप्त होगा | दक्षिण में एक जाति'नाग'पाई जाती है | क्या वे लोग नाग(सर्प) हैं | 
नागों का लंका के कुछ भागों पर ही नहीं प्राचीन मलाबार प्रदेश पर भी काफी दिनों तक 
अधिकार रहने के प्रमाण मिलते हैं | रामायण में सुरसा को नागों की माता और समुद्र 
को उसका अधिष्ठान बताया गया है | मैनाक और महेन्द्र पर्वतों की गुफाओं मे भी  ये 
निवास करते थे |समुद्र लांघने की हनुमान की घट्ना को नागों ने प्रत्यक्ष(५/१/८४-
बा.रामा.)देखा था | नागों की स्त्रियां अपनी सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध थीं(५/१२/२१-
बा.रा.)| नागों की कई कन्याओं का अपहरण रावण ने किया था(५/१२/२२ बा.रा.)|
रावंण ने नागों की राजधानी भोगवती नगरी पर आक्रमण करके(७/२३/५,६/७/९,-
३/३२/१४)वासुकी,तक्षक,शंख और जटी नामक प्रमुख नागराजों को धूल चटाई थी |
कालान्तर में नाग जाति के इक्का दुक्का को छोड़कर प्रथम शताब्दी में प्रभुत्व में आई 
चेर जाति में समाहित होने के प्रमाण हैं(सप्तम ओरिएंटल कांफ्रेन्स विवरणिका-१९३३-
सा उथ इन्डिया इन द रामायन-वी.आर.रामचन्द्र )|
         स्वंय तुल्सी दास ने लंका की शोभा का वर्णन करते हुए लिखा है -
               वन बाग उपवन वाटिका सर कूप वापी सोहहिं,
               नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहिं | 
                      इसी प्रकार बाल्मीकि रामायण में रावण को जगह-जगह दशानन,दश-
कन्धर,दशमुख और दशग्रीव आदि पर्यायों से सम्बोधित किया गया है | इसका शाब्दिक 
अर्थ दस मुख या दस सिर मानकर रावण को दस सिरों वाला अजूबा मानलिया गया |
जबकि बाल्मीकि द्वारा प्रयुक्त इन विशेषणों का तात्पर्य-"द्शसु दिक्षु आननं(मुखाज्ञा)-
यस्य सः दशाननः अर्थात रावण का आदेश दसों दिशाओं में व्याप्त था | इसी लिये वह
दशानन या दशमुख कहलाता था | यही नहीं कवि ने पक्षीराज जटायु के मुख से  ही 
कहलाया है कि वह दशरथ का मित्र है | रामायण में घटे प्रसंगो और घटनाओं से ही 
स्पष्ट हो जाता है कि जटायु गिद्ध नहीं मनुष्य था | कवि ने आर्यों के आदरसूचक -
शब्द आर्य का कई बार जटायू के लिये प्रयोग किया है | रामायण में जगह-जगह -
जटायू के लिये पक्षी शब्द का प्रयोग भी किया गया है | इसका समाधान ताड्यब्राह्म्ण 
से हो जाता है जिसमें उल्लिखित है कि-"ये वै विद्वांसस्ते पक्षिणो ये  विद्वांसस्ते  पक्षा"
(ता.ब्रा.१४/१/१३)अर्थात जो जो विद्वान हैं वे पक्षी और जो अविद्वान(मूर्ख) हैं वे पक्ष-
रहित हैं |जटायु वान-प्रस्थियों के समान जीवन व्यतीत कर रहे थे | ज्ञान तथा कर्म 
उनके दो पक्ष थे जिनसे उड़कर(माध्यम से)वे परमात्मा प्राप्ति का प्रयास कर रहे थे |
अतः उनके लिये पक्षी का सम्बोधन सर्वथा उचित है |
                वानरों का अपना आर्यों से मिलता जुलता राजनैतिक संगठन था इसका
वर्णन बाल्मीकि ने अनेक प्रसंगों में किया है | उल्लेख कपि राज्य के रूप में किया 
गया है | जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी एक सुसंगठित शासन व्यवस्था थी एक -
प्रसंग में तो बाली के पुत्र अंगद ने सुग्रीव से प्रथक वानर राज्य गठन का विचार तक 
कर लिया था (०४/५४/०१)| सीता की खोज में दक्षिण गए वानरों के समूह से समुद्र 
की अलांघ्यता महसूस कर अंगद कहते है-          
                  कस्य प्रसाद्दारांश्च पुत्रांश्चैव गृहाणि च |
                  इतो निवृत्ता पश्येम सिद्धार्थाः सुखिनो वयम् |(०४/४६/१७)
अर्थात- किसके प्रसाद से अब हम लोगों का प्रयोजन सिद्ध होगा और हम सुख पूर्वक -
लौटकर अपनी स्त्रियों,पुत्रों अट्टालिकाओं व गृहों को फिर देख पाएंगे |
     विभिन्न स्थानों पर बाल्मीकि ने वानर नर नारियों की मद्यप्रियता का भी उल्लेख
 किया है | वानरों के सुन्दर वस्त्राभूषणों का भी हृदयग्राही वर्णन स्थान-स्थान पर
 आता है | सुग्रीव के राजप्रसाद की रमणियां"भूषणोत्तम भूषिताः (०४/३३/२३)थीं |
                      वानर पुष्प,गंध,प्रसाधन और अंगराग के प्रति आग्रही थे|किष्किंधा का
वायुमण्डल चंदन, अगरु और कमलों की मधुर गंध से सुवासित रहता था (चन्दनागुरु-
पद्मानां गन्धैः सुरभिगन्धिताम्(०४/३३/०७)|  
               सुग्रीव का राज्याभिषेक जो बाल्मीकि जी ने(समकालीन एंव इतिहासवेत्ता-
होने के कारण)वर्णित किया है शास्त्रीय विधिसम्मत परम्परागत प्रणाली के अधीन ही 
सम्पन्न हुआ था | इस तथ्य का द्योतक है कि वानर आर्य परम्पराओं और रिति -
रिवाजों का पालन करते थे अर्थात आर्य परम्पराओं के हामी थे | बाली का आर्यरीति 
से अन्तिम संस्कार और सुग्रीव का आर्य मंत्रों और रीति से राज्याभिषेक भी सिद्ध -
करता है कि चाहे वानर आर्येतर जाति हों थे उनके अनुपालनकर्ता मानव ही बन्दर -
नहीं | यहां यह भी उल्लेख करना आवश्यक होगा कि बाल्मीकि रामायण जो तत्का-
लीन इतिहास ग्रंथ के रूप में लिखा गया था के अनुसार वानरों की जाति पर्याप्त सु-
संस्कृत और सुशिक्षित जनजाति थी | सुग्रीव के सचिव वीरवर हनुमान बाल्मीकि -
रामायण के सर्वप्रमुख-उल्लिखित वानर हैं | जिन्होंने अपनी विद्वतता से मर्यादा पु-
रुषोत्तम श्री राम को सबसे अधिक प्रभावित किया और उनके प्रियों में सर्वोच्च स्थान 
भी प्राप्त करने में सफल रहे | वह वाक्यज्ञ और वाक्कुशल(०४/०३/२४) तो थे ही 
व्याकरण,व्युत्पत्ति और अलंकारों के सिद्धहस्ता भी थे | उनसे बात करके श्रीराम ने
यह अनुमान लगा लिया कि- जिसे ऋग्वेद की शिक्षा न मिली हो, जिसने यजुर्वेद
का अभ्यास न किया हो तथा जो साम वेद का विद्वान न हो वह इस प्रकार की -
सुन्दर भाषा का प्रयोग( नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः | नासामवेद्विदुषः शक्य-
मेवं विभाषितुम् || नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् | बहु व्याहरतानेन न
किंचिदपशव्दितम् ||०४/०३/२८-९) नहीं कर सकता | हनुमान उन आदर्श सचिवों 
में सर्वश्रेष्ठ थे जो मात्र वाणी प्रयोग से ही अपना प्रयोजन प्राप्त कर सकते थे |     
         सार संक्षेप में हनुमान एक पूर्णमानव,बल,शूरता,शास्त्रज्ञान पारंगत,
उदारता,पराक्रम,दक्षता,तेज,क्षमा,धैर्य,स्थिरता,विनय आदि उत्तमोत्तम गुणसम्पन्न
(एते चान्ये च बहवो गुणास्त्वय्येव शोभनाः|०६/११३/२६) पूर्ण मानव थे अर्ध मा-
नव या बन्दर नहीं थे |
              और अब अन्त में उस तथ्य पर विचार जिसके आधार पर वानरों और 
विशेषकर वीरवर हनुमान की बन्दर स्वरूप की कल्पना हुई | अर्थात उनकी पूंछ  के
यथार्थ पर विचार करें |
          "वानर शब्द की इस जाति के लिए बाल्मीकि रामायण में १०८० बार -
आवृति हुई है तथा इसी के पर्याय स्वरूप 'वन गोचर','वन कोविद','वनचारी'और 
'वनौकस' शब्दों का भी प्रयोग किया गया है | इससे स्पष्ट होता है कि वानर शब्द -
बन्दर का सूचक न होकर वनवासी का द्योतक है | इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार करनी 
चाहिये-वनसि(अरण्ये)भवः चरो वा वानरः=वनौकसः,आरण्यकः |  वानरों के लिये -
हरि शब्द ५४० बार आया है |इसे भी वनवासी आदि समासों से स्पष्ट किया गया है |
'प्लवंग' शब्द जो दौड़ने की क्षमता का व्यंजक है, २४० बार प्रयुक्त हुआ है | वानरों -
की कूदने दौड़ने की प्रवृत्ति को सूचित करने के लिये प्लवंग या प्लवंगम् शब्द का व्य-
हार उपयुक्त भी है | हनुमान उस युग के एक अत्यन्त शीघ्रगामी दौड़ाक या धावक थे |
इसीलिये उनकी सेवाओं की कईबार आवश्यकता पड़ी थी | कपि शब्द ४२० बार आया 
है, जो सामान्यतः बन्दर के अर्थ में प्रयुक्त होता है | क्योंकि रामायण में वानरों को -
पूंछ युक्त प्राणी बताया गया है,इसलिये वे कपयः थे | वानरों को मनुष्य मानने में -
सबसे बड़ी बाधा यही पूंछ है | पर यदि सूक्ष्मता से देखा जाय तो यह पूंछ हाथ पैर 
के समान शरीर का अंग न होकर वानरों की एक विशिष्टजातीय निशानी थी,जो संभवतः
बाहर से लगाई जाती थी | तभी तो हनुमान की पूंछ जलाए जाने पर भी उन्हें कोई 
शारिरिक कष्ट नहीं हुआ | रावण ने पूंछ को कपियों का सर्वाधिक प्रिय भूषण बताया 
था-'कपीनां किल लांगूलमिष्टं भवति भूषणम्(०५/५३/०३)"-(रामायणकालीन समाज-
शांति कुमार नानूराम व्यास) |
                   इस संबन्ध में यह अवगत कराना भी उचित होगा कि पूर्वोत्तर राज्यों में 
अभी भी ऐसी कई जातियां हैं जो अपने सर पर जंगली पशुओं के दो सीग धारण करके 
अपनी शक्ति और वीरता का परिचय हर उत्सव के समय  देते हैं तो क्या उन्हें जंगली
भैंसा या बैल मानलिया जाय | मध्य प्रदेश की मुण्डा जनजाति में भी यही परिपाटी है |
शायद शक्ति प्रदर्शन के साथ ही यह सर की सुरक्षा का एक सरल उपाय होता हो |जिस 
प्रकार क्षत्रिय या सैनिक अपनी पीठ पर सुरक्षा के लिये गैंडे की खाल से बनी ढाल को 
पहनते रहे हैं हो सकता है वानर वीर भी अपने पृष्ट भाग क़ी सुरक्षा हेतु बानर की पूंछ 
के समान धातु या फिर लकड़ी अथवा  किसी अन्य हल्की वस्तु से बनी दोहरी वानर -
पूंछ को पीछे से जिधर आंखें या कोई   इन्द्रिय सजग   नहीं होती की ओर से हमला
बचाने के लिये लगाया जाता हो | क्योंकि बाली,सुग्रीव या अंगद की पूंछ का कहीं पर 
भी कोई जिक्र नही आता है यह भी अजीब बात है या नहीं ? इस विषय पर भी खोज 
और गहरा  अध्ययन आवश्यक है | ताकि कारणों का पता चल सके |
                 यहां यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि बाल्मीकि रामायण में किसी भी 
जगह या प्रसंग में वानरों की स्त्रियों के पूंछ होने का उल्लेख या आभास तक नहीं है |
          यह भी उल्लेखनीय है कि अन्वेषकों ने पूंछ लगाने वाले लोगों या जातियों 
का भी पता लगा लिया है |बंगाल के कवि मातृगुप्त हनुमान के अवतार माने जाते थे,
और वे अपने पीछे एक पूंछ लगाए रहते थे (बंगाली रामायण पृष्ट्-२५,दिनेश चन्द्र सेन)
भारत के एक राजपरिवार में राज्याभिषेक के समय पूंछ धारण कर राज्यारोहण का 
रिवाज था ( वही )| वीर विनायक ने अपने अण्डमान संसमरण में लिखा है कि वहां 
पूंछ लगाने वाली  एक जनजाति रहती है(महाराष्ट्रीय कृत रामायण-समालोचना)|
                उपरोक्त तथ्यों से इस भ्रान्ति का स्पष्ट निराकरण हो जाता है कि वानर 
नामक जनजाति जिसके तत्कालीन प्रमुख सदस्य वीरवर हनुमान थे एक पूर्ण मानव 
जाति थी ,  बन्दर प्रजाति नहीं | हां उनकी अत्यधिक चपलता,निरंकुश और रूखा -
स्वभाव,चेहरे की (संभवतः पीला रंग और मंगोलायड मुखाकृति जो थोडी बन्दरों  से 
मिलती होती है)  बनावट के कारण ही तथा अनियमित यौन उच्छृंखलता,वनों,पहाड़ों 
में निवास,नखों और दांतों का शस्त्र रुप में प्रयोग और क्रोध या हर्ष में किलकारियां
मारने की आदत के कारण उन्हें एक अलग पहचान देने के लिये ही आर्यों ने उनके 
लिये कपि या शाखामृग विशेषण का प्रयोग किया  हो और जो   आदतों पर सटीक
बैठ जाने के कारण आमतौर से प्रयोग होने लगा हो | जिसने इनके पूर्व जातिनाम 
का स्थान ले लिया हो | इस जनजाति के किसी अन्य जाति में विलय या संस्कृति 
नष्ट हो जाने के उपरान्त कपि शब्द ने, पर्याय के स्थान पर प्रमुख उदबोधन का -
स्थान ले लिया हो | मन्मथ राय ने वानरों को भारत के मूल निवासी 'व्रात्य' माना
है (चिं.वि.वैद्य-द रिडिल आफ दि रामायण पृ.२६)|  के. एस. रामास्वामी शास्त्री ने -
वानरों को आर्य जाति माना है | जो दक्षिण में बस जाने के कारण आर्य समाज से 
दूर होकर जंगलों में सिमट गई और फिर आर्य संस्कृति के पुनः निकट आने पर 
उसी में विलीन हो गई| व्हीलर और गोरेशियो आदि अन्य विद्वान दक्षिण भारत की
पहाड़ियों पर निवास करने वाली अनार्य जाति मानते हैं जो आर्यों के सन्निकट आ-
कर उन्हीं की संस्कृति में समाहित हो गई | यह जनजाति या जाति चाहे आर्य रही 
हो या अनार्य थी एक विकसित आर्य संस्क़ृति के निकट, ललित कलाओं के साथ
चिकित्सा,युद्ध कला,रुप परिवर्तन कला और अभियन्त्रण ( अविश्वसनीय लम्बे-
लम्बे पुल बनाने की कला सहित),गुप्तचरी और मायावी शक्तियों के प्रयोग में बहुत 
चतुर मानव जाति | कोई पशुजाति नही थी |  इसके तत्कालीन सिरमौर वीर-
वर हनुमान एक श्रेष्ठ मानव थे बन्दर नहीं |
          वानरों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्वंय वाल्मीकि रामायण क्या कहती है यह 
भी अत्यन्त स्पष्ट घोषणा है कि वानर अधिकतर देवताओं के पुत्र थे | बालकाण्ड के
सत्रहवें सर्ग मे इनकी उत्पत्ति का विवरण निम्न प्रकार है -
              जब भगवान विष्णु महामनस्वी राजा दशरथ के पुत्र भाव को प्राप्त हो
गये,तब भगवान ब्रह्मा जी ने सम्पूर्ण देवताओं से इस प्रकार कहा (१)-
               प्रधान-प्रधान अप्सराओं,गन्धर्वों की स्त्रियों,यक्ष और नागों की कन्याओं,
रीछों(नागों के समान यह भी कोई जाति रही होगी-लेखक)की स्त्रियों,विद्याधरियों,किन्नरियों
तथा वानरियों (स्पष्ट है यह भी अन्य जातियों की तरह कोई मनुष्य जाति थी होगी तभी 
वाल्मीकिने अन्य जातियों के साथ वानरियों शब्द का उल्लेख किया है-लेखक)के गर्भ से 
वानररूप -(सम्भवतः वन में रहने वाले-लेखक) में अपने ही तुल्य पराक्रमी पुत्र उत्पन्न 
करो(५-६)|
              भगवान ब्रह्मा के ऐसा कहने पर देवताओं ने उनकी आज्ञा स्वीकार की और -
वानररूप में अनेकानेक पुत्र उत्पन्न किये | महात्मा,ऋषि,सिद्ध,विद्याधर,नाग और चारणों 
ने भी वन में विचरने वाले वानर-भालुओं के रूप में वीर पुत्रों को जन्म दिया (९)|
              किस देवता ने किस वीर बानर को उत्पन्न किया इसका भी विवरण उन्होंने 
स्पष्ट किया है -
          देवराज इन्द्र ने वानरराज बाली को पुत्र रूप में उत्पन्न किया | जो महेन्द्र -
पर्वत के समान विशालकाय और बलिष्ट था | तपने वालों में श्रेष्ट भगवान सूर्य ने सुग्रीव 
को जन्म दिया (१०)|
          हनुमान नाम वाले ऐश्वर्यशाली वानर वायुदेवता के औरस(जायज-लेखक) पुत्र 
थे | उनका शरीर वज्र के समान सुदृढ था | वे तेज चलने में गरूड़ के समान थे (१६)|
          सभी श्रेष्ट वानरों में वे सबसे अधिक बुद्धिमान और बलवान थे | इस प्रकार कई 
हजार वानरों की उत्पत्ति हुई| वे सभी रावण का वध करने के लिये उद्यत रहते थे(१७)|
          कुछ वानर रीछ जाति की माताओं से तथा कुछ किन्नरियों से उत्पन्न हुए |
देवता,महर्षि,गन्धर्व,गरूड़,यशस्वी यक्ष,नाग,किम्पुरूष,सिद्ध,विद्याधर तथा सर्प जाति के -
बहुसंख्यक व्यक्तियों ने अत्यन्त हर्ष में भर कर सहस्त्रों पुत्र उत्पन्न किये | वे सब 
जंगली फल-मूल खाने वाले थे(२३)|
          मुख्य-मुख्य अप्सराओं,विद्याधरियों,नाग कन्याओं तथा गन्धर्व-पत्नियों के गर्भ
से भी इच्छानुसार रूप और बल से युक्त तथा स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचरण करने में 
समर्थ वानर पुत्र उत्पन्न हुए(२४)|
          उपरोक्त विवरण स्वमेव सिद्ध करता है कि स्वंय वाल्मीकि वानरों को वन में 
रहने वाली स्वेच्छाचारी मनुष्य जाति ही मानते थे | बन्दर तो बिल्कुल भी नहीं माना
है उन्होंने | और हम हैं कि हमने वीरवर हनुमान को जो सर्वगुण सम्पन्न देवपुत्र मानव
थे को बन्दर का विद्रूप स्वरूप प्रदान कर दिया केवल कुछ शब्दों का गलत अर्थ लगा 
कर या तो अनजाने में या फिर बुद्धिहीनता के वशीभूत | गलती आज भी सुधारलें तो 
कोई देर नहीं हुई है |और अन्त में वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग युद्ध काण्ड से-जब
श्री राम की आज्ञा से उनकी सकुशल वापसी का सुसमाचार देने के लिये हनुमान भरत
की कुटिया में जाकर उन्हें यह समाचार देते हैं तो भरत प्रसन्नहोकर उन्हें यह् कहते हैं -
          "भैया! तुम कोई देवता हो या मनुष्य,जो मुझ पर कृपा कर यहां पधारे -
हो? सौम्य! तुमने जो यह प्रिय संवाद सुनाया है, मैं इसके बदले तुम्हें कौन सी वस्तु 
प्रदान करूं ?(मुझे तो कोई ऐसा बहुमूल्य उपहार नहीं दिखाई देता,जो इस प्रिय सम्वाद
के तुल्य हो)(४३)|
                      "(तथापि)मैं तुम्हें इसके लिए एक लाख गौएं,सौ उत्तम गांव तथा उत्तम -
आचार विचार वाली सोलह कुमारी कन्यायें पत्नी रूप में समर्पित करता हूं(ब्रह्मचारी होने
के कारण हनुमान ने सम्भवतः कन्याओं को लेना स्वीकार न किया हो-लेखक) | उन 
कन्याओं के कानों में सुन्दर कुण्डल जगमगाते होंगे | उनकी अंग कान्ति सुवर्ण के समान 
होगी | उनकी नासिका सुघड़,ऊरू मनोहर और मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर होंगे | वे 
कुलीन होने के साथ ही सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित होंगी "(४४-४५)|
                  यह प्रसंग भी क्या यह सिद्ध नहीं करता कि हनुमान मानव ही थे तभी -
तो उन्हे सोलह रूपवती कुलीन कन्याएं पत्निस्वरूप भेंट की जा रही थीं | किसी बन्दर को 
कुलीन कन्याएं पत्निस्वरूप भेंट करने का क्या औचित्य होता? यह हमारा विवेक और 
बुद्धि स्वंय निर्णय कर सकती है |  
                      -धन वर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-262308 (उ०ख०)   मो०-09410718777 

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

अस्लियत-ए-थाना



चोर चुरा कर ले गए,घर के थाल-परात |
भान हुआ इस बात का हमको बीती रात |
हमको  बीती  रात,दौड़  कर थाने धाए,
किन्तु  वहां  पर हमने,सारे सोते पाए |
कहे 'राज' कविराय,हिलाकर बहुत जगाया,
हारगए तब,उसकोसौ का नोट दिखाया |

बन्दआंख से दिख गया,मुंशी जी को नोट |
उठकर सीधा हो गया,मारा   हमें सलूट |
मारा  हमें सलूट,कौन काम से आया पूछा,
किस्सा हमने,बता  दिया चोरी का पूरा |
कहे 'राजकवि' कहा नोट को अन्दर करके,
आ दो दिन के बाद,अभी जा सोजा घर पे |

क्यों दोदिन के बाद क्यों लिखिये अभी रिपोर्ट |
अभी लिखो जो आप तो,क्या है उसमे खोट |
क्या   है उसमे खोट,कहा  तो वह्  गुर्राया,
और कान में चुपके से,यह   राज़  बताया |
बोला   जी डी चल  रही,दो दिन पीछे यार,
लिक्खूं  कैसे मैं  रपट,बेबस  है  सरकार  |

भागी कन्या पकड़ कर,लाए   दरोगा साब |
दो दिन से निबटा रहे,उसका सभी हिसाब |
उसका सभी हिसाब,'स्टेटमेंट'  उसके लेते हैं,
लेकर  'पूर्ण बयान',सीनियर  को  देते हैं |
कहे 'राज कविराय',आज 'एस ओ' जी लेंगे,
ले कर 'पूर्ण बयान',पेश  न्यायालय  कर देंगे |

इसी लिए 'जी डी' रूकी,परसों होगा काम |
कर्म जरूरी  'ब्यान'  है,लेते सब हुक्काम |
लेते सब हुक्काम,बहुत  से 'हफ्ते' आने हैं,
 मुझको ही नीचे  से ऊपर तक, बंटवाने हैं |
कह मुंशी सुन 'राज',रपट परसों लिखवाना,
स्टेटमेंट लेने में,बहुत बिजी है, कलसे थाना |

होते भी खाली यदि,काम ये क्या कर लेंगे |
ले इन्क्वायरी  नाम, रोज घर पर पहुंचेगे |
बटर टोस्ट के साथ,मुफ्त  की चाय पियेंगे |
उल्टे   सीधे  कई,आप  से  प्रश्न  करेंगे |
दे कर सौ का नोट,हमें मिल गया इशारा |
झेलो सब  नुकसान,न आओ यहां दुबारा |
***

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

श्रेष्ठ रूबाई हो ?



'सतसईया' का दोहा हो या,  'पदमावत'चौपाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
      केश-कज्जली ,छवि कुन्दन सी,
      चन्दन जैसी   गंध   लिये |
           देवलोक    से     पोर-पोर में,
           भर    लाई   क्या  छंद प्रिये | 
 चक्षुचकोर,चन्द्रमुख चंचल,चन्दनवन से आई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
           रक्त - कपोल ,   नासिका तीखी, 
      अधर  पगे, मधु    प्याले से |
           क्षण-क्षण मुस्कानों से पूरित-,
      मृग-नयना ,   मतवाले    से |
मदमाती,मदमस्त,मुखर सी,मस्त-मस्त अंगडाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की, सबसे  श्रेष्ठ रुबाई हो ?
      देह-कलश  से बरस    रही है, 
          यौवन   की   रसधार    प्रिये  |
      पुष्प - लता सी  स्वर्ण-देह में,
          घुंघरू   सी   झनकार   प्रिये |
मलयागिरि से चली मस्त हो,  मंद वही पुरवाई हो ?        या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
             मेरे लिये सुमुखि आई हो ?,
        धरती पर  नव-छन्द लिए |
            महक रहा  जो  मधुर गंध  से,
            अमृत-घट  निज  संग  लिए |
सप्त-लोक के सप्त-सुरों की , सतरंगी  -  शहनाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

सोमवार, 22 जुलाई 2013

उत्तराखण्ड-विनाश पर कुछ दोहे



बोतल में गंगा भरी, बुझी न अनबुझ प्यास |
नदियों को झीलें बना,अदभुत किया  विकास ||

खण्ड-खण्ड पर्वत किये, खीँच-खीँच कर खाल |
कब्रगाह घाटी बनी,  होकर झील    विशाल ||

मन्दिर पूरा बच गया, बची नहीं टकसाल |
बना शिवालय क्षेत्र सब, शव-आलय बेहाल ||

यह थी केवल बानगी, आगे क्या हो खेल |
अफसर-नेता स्वार्थ का, जारी रहा जो खेल ||

उड़ मंडराते फिर रहे, गद्दी के सब गिद्ध |
मलबे में बिखरे पड़े, मुर्दा-निर्धन, सिद्ध ||

वन-नदियाँ गिरवीं रखीं, बेचे सभी पहाड़ |
स्वार्थ हेतु अब बंद हो, पर्वत से खिलवाड़ ||

दानपात्र को तोडकर, बिन कुछ शर्म-मलाल |
ढोंगी साधू ले उड़े, मुद्रा, भूषण -  माल ||

खोली शिव ने एक लट, बही धार विकराल |
पूर्ण जटा जो खोलते, होता तब क्या हाल ||

रविवार, 21 जुलाई 2013

क्रान्ति-उदघोष


 
                             
लेखनी में अग्नि भर कर,  लिख अनल कविता नवल |
देश  ने  तुझको  पुकारा  , युद्ध को  कवि-वर निकल |
               ये शिखण्डी कब न जाने ,
               भेंट कर दें  देश     को |
               पीढियां रह जायं  तकती ,
               शून्य से    अवशेष  को |
लौह सम दीवार  में ढल ,हो  खड़ा   आगे  अटल |
देश  ने तुझको  पुकारा - युद्ध  को  कवि-वर निकल |
                मौन  है   नेतृत्व    अब, -
                कर रहा  है  अतिक्रमण |
                ढक लिया चहुंओर उसने ,
                एक  कलुषित  आवरण |
दे नया नेतृत्व  सब  को, तुष्ट  हो जन मन विकल |
देश  ने तुझको  पुकारा  - युद्ध को  कवि-वर निकल |
                रूप  निर्मल  शारदे  का ,
                अब बदल  निर्मम  बना |
                रूप   दुर्गा   का   उसे  दे,-
          न्याय   का  सरगम बना |
गीत में, संगीत मे  रख ,  धार   खांडे  सी  विरल |
देश ने तुझको  पुकारा  - युद्ध को  कवि-वर निकल |

शनिवार, 20 जुलाई 2013

टीस मन की सनसनाई




छू गई पुर वा जरा सा,      टीस   मन  की  सनसनाई |
आस मन में प्रिय मिलन की,सिर छुपाकर गुनगुनाई |
         बस चुकी हो तुम नयन में,
         प्रीत बनकर , नेह बनकर |
         ढेर सपने हैं   पलक  पर ,        
         चांदनी रातों में  सज कर |
प्यास अधरों पर मिलन की,फिर उभर कर आज आई |
छू गई पुर वा जरा सा,        टीस   मन  की  सनसनाई |
         छा रहा उन्माद पल-पल,
         वेदना की टीस तज कर |
         चाहता है साथ प्रिय का,
         फिर समा जाना परस्पर |
भर चुका सुधियों से आंगन,प्यार की झालर लजाई |
छू गई पुर वा जरा सा,    टीस   मन  की  सनसनाई |
         प्यार की सौगात लेकर,आ-
         भी जाओ, मत सताओ |
         भूल कर संसार को अब-
         पाश में  मेरे   समाओ |
है सभी संसार नश्व्वर,      जो घड़ी बीती   न    आई |
छू गई पुर वा जरा सा,   टीस   मन  की  सनसनाई |

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

मोदी के कुछ तीर



मोदी ने जब तानकर, छोड़ दिए कुछ तीर |  
भन्नाए से घूमते, सुन कर कई   वजीर |
सुन कर कई वजीर, फाड़ते   रोकर  छाती,
बुरका, पप्पी बाँध गले से,  चपर-कनाती |
कहे 'राज' कवि-मित्र, लिए पप्पी को गोदी,
चक्कर में सरकार, मस्त- मुस्काता मोदी |



गुरुवार, 18 जुलाई 2013

होली पर दो कुंडलियाँ


होली के  त्योहार  पर, बरसें रंग  हजार |     
शत्रु-मित्र हर एक का, पाएं अदभुत प्यार |
पाएं अदभुत प्यार, छ्टा हो रंग - बिरंगी,
रहे आप से दूर, दुष्ट - मन हर  हुड़्दंगी |
कहे 'राजकवि' खेलें,जमकर आँख मिचौली,
होली पर हों,  क्लेशहीन-सतरंगी  होली |
-०-
होली पर अपना रखें, नियमित हर आचार |
हर हुड़दंगी से रखें, प्रेम - पूर्ण   व्यवहार |
प्रेम - पूर्ण व्यवहार,  नहीं उलझें - उलझाएं,
नशेबाज से दूर रहें, अति निकट न जाएं |
कहे 'राजकवि' होली पर कविता की चोली ,


जन-मानस में बाँट, मनाली अपनी होली |

बुधवार, 17 जुलाई 2013

माँ



माँ के ऋण से कब हुई,उऋण कभी सन्तान |
माँ के कारण ही मिली, हमको हर  पहचान |
हमको हर  पहचान, ऋणी  हर रोम हमारा ,
इसके कण-कण से बनता यह तनमन  सारा |
कहे 'राज'  कवि,  करें हितों की रक्षा माँ के ,
तन-मन-धन ,सब अर्पण करदें अपनी माँ के |
-०-       
रिश्ते सारे स्वार्थ के,  माँ का है  नि:स्वार्थ  |
कोई भी इसमें कभी, मिला नहीं निहितार्थ |
मिला नहीं निहितार्थ, प्रेम पर यह आधारित,
यही सनातन सत्य,  किया सबने उद्भाषित |
कहे 'राज' कवि, माँ के चरण जगत में न्यारे  ,
निहित इन्हीं में, जग में समुचित रिश्ते सारे |
-०-                 
माता के दिल सा कही, नहीं और कुछ मित्र |
माता के दिल में बसें,  वही  पुराने   चित्र  |
वही  पुराने  चित्र,  क्षमा   से परिपूरित है ,
पीर, प्रेम, वात्सल्य,  शीर्ष  तक आधारित है |
कहे  'राज'  कवि,  आंचल में  संसार समाता  ,


बच्चों को सुख -चैन, अभय सब  देती माता |