गुरुवार, 27 जून 2013

सरस्वती माँ




माँ सरस्वती 
कण-कण तन का उज्ज्वल करदे |
एक नवल तेज, अविकल  करदे |
माँ सरस्वती आ,    कंठ समा,
मन-मस्तक को अविरल करदे |

वाणी में मधु की,    धार बहा |
हो सृजनशील,  मस्तिष्क महा |
हर शब्द बने,  मानक जग में,
हर रचना को,  इतिहास बना |

जन की जिव्हा पर,   नाम चढ़े,
इतना मधुमय, अविचल करदे |
माँ सरस्वती आ,     कंठ समा,
मन मस्तक को अविरल करदे |

हो सृजित नया, जन के मन का,
हर शब्द लगे, नव उपवन का |
परिपूरित,      अद्भुत गंधों से,
वैकुण्ठ लोक के,   मधुवन सा |

रचना में,     श्रेष्ट समन्वय  हो,-
हर शब्द दिव्य-परिमल करदे |
माँ सरस्वती आ,     कंठ समा,
मन मस्तक को अविरल करदे |

बुधवार, 26 जून 2013

हम पर आता है





हम पर आता है 
मादक-मलय मस्त-मस्त,  मंद-मंद  लिए-
करता काम-केलि,     हिमश्रृंग पर आता है|
शीतल, सहज-शांत,  तन में  सौन्दर्य समा-
बहु - विधि, बादल, बहार, बन  जाता  है|
पानी  नहीं, प्रीत के प्रतीक पंख - पांवड़े -
पूर्णिमा के पुण्य ,  पूर्ण - पथ में बिछाता है|,
दूर कहीं दुंदुभी -  निनाद - संवाद   कर- 
प्रेम के प्रसून, प्रेम - पुष्ट   बरसाता   है|
अविरल, अनन्त - अवशेष रह जाय  यह-
क्रम किस भांति, कौन किसका निभाता है|
पर्यावरण परिपूर्ण 'राज',  पूरित हो पूर्व सा-
आज यह दायित्व सब, हम  पर आता है|

सोमवार, 24 जून 2013

खटीमा-एक नज़र में





                                                            खटीमा-एक नज़र में
                                   -डा.राजसक्सेना
      भारत के अधिकांश ग्रामों की तरह खटीमा ग्राम का इतिहास सदियों पूर्व तक 
जाता है |  1814 में गोरखों से हुई सिगंरौली सन्धि के अधीन वर्तमान गढवाल और
कुमांऊ कमिश्नरियों का स्वामित्व ब्रिटिश हाथों में आया किन्तु उस समय तराई  का
यह क्षेत्र जिसका खटीमा भी एक अंग था नेपाली आधिपत्य में नहीं था और न ही-
किसी पर्वतीय राजा के अधीन या उनके राज्य का हिस्सा था |
                वस्तुतः तराई क्षेत्र जो लगभग 145 कि.मी.और 20 से 25 कि.मी.
की लम्बाई-चौड़ाई की सघन वनों से आच्छादित दुर्गम दलदली झीलों के बाहुल्य 
तथा लम्बी घास एंव हिंसक पशुओं से भरी पड़ी एक पट्टी थी और विद्रोहियों व
अपराधियों की शरण स्थली थी सन 1802 में ही एक प्रथक कमिश्नरी के रूप में
उ०प्र० के गोरखपुर जिले के तराई भाग से काशीपुर के जसपुर तक आ चुकी थी |   
      1887-88 में ब्रिटिश भारत के इस भाग के हुए बंदोबस्त में कुछ इनी-गिनी
 झोपड़ियों का यह गांव खटेमा नाम से किच्छा तहसील(तहसील भवन 1890 में निर्मित)
 की सब-तहसील बनकर  (KHATEMA)अस्तित्व में आया खटीमा(स्थानीय पूर्वनाम-
 खत्तेमा)सब तहसील भवन(पेशकारी-ना.तहसीलदार)वर्ष 1905 में बन कर तैयार हुआ |  | 
1888 से पूर्व खटीमा परगना बिल्हैरी का भाग था या इसी का नाम बिल्हैरी रहा हो ?
आज भी रेवेन्यु रिकार्ड़ में खटीमा के परगने का नाम बिल्हैरी दर्ज है जबकि इस 
नाम का कोई ग्राम या नगर इस क्षेत्र में उपलब्ध नहीं है | सन 1857में अंग्रेजों-
की सहायता नेपाल सरकार द्वारा किये जाने के फ्लस्वरूप अंग्रेजो द्वारा प्रसन्न हो-
कर तत्कालीन अवध राज्य की तराई का थारू बाहुल्य क्षेत्र जो वर्तमान में नेपाल 
के पश्चिम्-दक्षिण के तीन जिलों के रूप में विद्यमान है,नेपाल सरकार को शारदा
नदी के पूर्व की ओर प्रदान किया तथा रूहेला सरदारों के नियन्त्राधीन रह चुके भाग 
जिसमें खटीमा भी शामिल है को ब्रिटिश तराई के रूप में अपने नियन्त्रण में ही 
रखा था | स्मरणीय है कि सन 1802 में लार्ड वेलेजली के समय अवध के नवाब 
से हुई सहायक सन्धि के अधीन तराई का गोरख पुर और रूहेल खण्ड अंग्रेजों के 
नियन्त्रणाधीन हो चुके थे |  इस प्रकार इस क्षेत्र पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का -
कब्जा हो गया था और 1857 में इसका शारदा नदी से पूर्व का कुछ भाग नेपाल 
को सौंप देने के कारण परगना बिल्हैरी का मुख्य भाग भी नेपाल में चले जाने 
 से ब्रिटिश क्षेत्र में परगना बिल्हैरी का कुछ भाग रह जाने के कारण, परगने का
नाम तो रह गया भौतिक अस्तित्व समाप्त हो गया |
               नव गठित तराई जिले में तब सहजगीर(जसपुर),कोटा(काशीपुर),मुड़िया
(बाजपुर),बड़ाखेड़ा(गदर्-पुर),किलपुरी(किच्छा-सितारगंज),बक्शी(नानकमत्ता) तथा बिल्हैरी
कुल सात परगने(तत्कालीन स्थानीय शासन केन्द्र्)सम्मिलित थे जो खाम स्टेट के नाम
 से अलग कमिश्नरी थे और दो तीन टुकड़ों में इन्हें नैनीताल जिला, अल्मोड़ा कमिश्नरी
 से काटकर बनाये जाने पर उसमेंसम्मिलित किया गया |पहले खटीमा बरेली कमिश्नरी
 में था और काशीपुर व जसपुर मुरादाबाद जिले का भाग थे | सुबरना या चिंकी
नाम से बहेड़ी भी इसी तराई में सम्मिलित था किन्तु नैनीताल जिला बनने पर तराई
 के जिले में सम्मिलन पर बहेड़ी बरेली जिले में ही रहने दिया गया और बिल्हैरी(खटीमा)
सम्मिलित किए गए थे | 05 अक्टूबर 1891 को जब अल्मोड़ा से कुछ क्षेत्र निकाल कर -
नैनीताल जिला बनाया गया तो तराई जिले  को उसमें समाहित कर दिया गया |
                            1896 में टनकपुर के भाबर क्षेत्र को तराई के क्षेत्र से काट कर 
अल्मोड़ा जिले  में मिला दिया गया |सन 1900 में तराई और भाबर को एक शासन 
सूत्र में बांधा गया और 'खाम की तराई भाबर स्टेट' का गठन किया गया | इसके
दस साल बाद  अल्मोड़ा के भाबर क्षेत्र को भी इसमे समाहित कर दिया गया और 
अल्मोड़ा के भाबर क्षेत्र का अंग होने के कारण टनकपुर भी तराई प्रशासन में सम्मि-
लित हो गया | 1802 में तराई पर अधिकार के  उपरान्त 1844 तक जसपुर(सहज-
गीर) और काशीपुर अलग राजस्व प्रभाग के रूप में मुरादाबाद जिले का अंग बने 
रहे | इस वर्ष मुरादाबाद जिले का पुनः सीमा निर्धारण हुआ और काशीपुर और 
जसपुर को मिलाकर तथा ठाकुर द्वारा,सुल्तानपुर पट्टी(सरकरा),मुरादाबाद्, और 
अफजल गढ के कुछ ग्रामों को मिला कर काशीपुर परगने का गठन किया गया |
सन 1856 में बाजपुर को भी तराई में मिला दिया गया | 
                       एक सदी के निरन्तर प्रयासों और नागरिक सुविधाओं में बढोत्तरी
के कारण तराई की आबादी में आशातीत वृद्दि हुई | वर्ष 1918 में इन्फ्लुएंजा-
महामारी के रूप में और फिर 1920 में हैजा महामारी के रूप में तराई में फैला |
उस समय तराई में चिकित्सा सुविधाओं का लगभग पूर्ण अभाव था |फलस्वरूप
प्रशासन ने तराई में चिकित्सा सुविधाओं के लिये बाजपुर,गदरपुर,रूद्रपुर,किच्छा,
सितारगंज और खटीमा में एक कम्पाउन्डर के अधीन छोटे अस्पतालों का   जाल 
बिछा दिया | यह वर्ष 1926 की बात थी | वर्ष 1928 में इन अस्पतालों के पक्के
भवनों का निर्माण हो चुका था |        
                               अभी जारी है .............

हिमालय


  हिमालय 

भारत मां के राज मुकुट सा,
सर पर जड़ा हिमालय |
जय जवान सा रक्षक बन कर,
तत्पर खड़ा हिमालय |

अविरल देकर नीर नदी को,
करता भरित हिमालय |
खेत उगलते सोना जिससे,
करता हरित  हिमालय |
  
झेल रहा बर्फीली आंधी, 
इधर  न आने   देता-,
कष्ट सभी अपने ऊपर ही, 
बिना कहे  ले  लेता |

सागर से उठते बादल को, 
 पार न  होने  देता |
भारत में बरसा कर बादल,. 
जलधि न खोने देता |

देता रहता  खनिज हमेशा, 
भारत धनिक बनाने,
सघन वनों को परिपूरित कर,
जीवन सुखद बनाने |

किन्तु नहीं हम जीने देते, 
इसको  जीवन   इसका |
धीरे-धीरे अंग भंग  कर,.  
कुतर रहे तन इसका |

कसम एक सब मिलकर खाएं,
हरा-भ्ररा हम इसे बनाएं,
लेता नहीं कभी बस देता, 
स्वर्णिम इसका  रूप बनाएं |

  धनवर्षा,हनुमानमन्दिर्,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)
          मो- 0941071877

रविवार, 23 जून 2013

निभाता कौन है






निभाता कौन है 

कब किसी के भी दुखों में,काम आता कौन है |
दो कदम भी साथ दे, जहमत उठाता कौन है |
सर्द हैं चेहरे सभी के, संवेदनायें मिट चुकी हैं,
गीत खुशियों के कभी भी,गुनगुनाता कौन है |
कारोबारी हो गए,इंसानियत   मन से  गयी,
घर पड़ोसी के भी मय्यत,हो तो जाता कौन है |
दूर तक फैला हुआ है,शून्य सा एक आजकल,
एक बच्चे की तरह अब ,खिलखिलाता कौन है |
आज बच्चा भी तरसता,मां से मिलने के लिये,
लोरियां लाड़ों भरी,  उसको  सुनाता कौन है |
ताबूत में सब बन्द जैसे,आज कब्रिस्तान में,
रस्में दुनिया"राज्"है पर,ये निभाता कौन है |

शनिवार, 22 जून 2013

कुत्तों को बिस्किट






कुत्तों  को बिस्किट 


खिलवाते कुत्तों को बिस्किट, लाखों भूखे सो जाते हैं |
जनता के पैसे से नेता,  जीवन भर मौज उड़ाते  हैं |
भारत में भूखे-नंगों को, दे नहीं पा रहे  पानी तक ,
पाकिस्तानी जल प्लावन में, लाखों डालर दे आते हैं |
घर अपना सिंगल कमरे का,सूनी आँखों का सपना है,
मंत्री जी पच्चिस  लाख मगर,पर्दों पर खर्च कराते हैं |
रोटी के टुकड़े को बचपन,जब तरस रहा है भारत में,
ये मुफ्तखोर `निर्धन नेता`,लाखों वेतन बढ़वाते  हैं |
बिक रही अस्मतें कौड़ी में, ये खुद क्रेता-विक्रेता  हैं ,
कमरे से बाहर आते ही,   ये 'गंगाजल' हो जाते हैं |
रखते हम चौकीदारी को, ये घर में लेते सेंध  लगा ,
अरबों डकार लेते रिश्वत, स्विसबैंक जमा करआते हैं |
होते हैं जब हम खड़े कभी, अब शठे-शाठ्यम कर देंगे,  
ये पीछे सी.बी.आई.लगा, 'भगवा' कहने लग जाते हैं | 
करो सुरक्षा `राज` स्वयं, मरती जनता तो मरने दो,
नक्सल,आतंकी छोड़ खुले, खुद बुलेट प्रूफ में जाते हैं |

शुक्रवार, 21 जून 2013

डरता नहीं




 डरता नहीं 

ये  सही है 'राज' सबके, वास्ते अच्छा नहीं |
हाँ बुरे लोगों से अपने, राब्ते रखता नहीं |
वो मिला करता है उनसे,कौम के जो दोस्त हैं,
देश के दुश्मन से कोई,सिलसिला रखता नहीं |
पर्वतों पर भी  बना  लेता है, वो राहें नई  ,
राह के काँटों से उसका, हौसला घटता नहीं |
बनगया है एक समन्दर,जर्फ़ जर्रा कम नहीं,
चार बूंदों से जो उफने,  तंग वो दरिया नहीं |
जोड़ रिश्ते बेवजह के, मीर वो बनता नहीं,
हो मुसीबत में कोई, तो फिर कभी रुकता नहीं |
रब की है तौफिक, या फिर माँ के दिल की है दुआ,
कातिलों की फौज से भी, वो कभी डरता नहीं |

गुरुवार, 20 जून 2013

गजल-ए-मुल्क




 गजल-ए-मुल्क 
उठ रही  दीवार से, अब देश  बचाना होगा |
प्यार के हार से, हर मोड़  सजाना होगा |
जिन्दगी भर जले, देश के हित लौ बनकर  ,
उन चिरागों को लहू,  देके  जलाना होगा |
बात हो दिल की मेरे,मुंह से तेरे जा निकले,
आइना दिल को बना, साथ निभाना होगा |
प्रेम की डोर से बंध कर के, बनें गुलदस्ता,
फिर से एक बार हमें,मुल्क जगाना होगा |
'राज' शैतान नहीं,  इंसान उगे  हर घर में,
ऐसा जीदार हमे,   मुल्क  बनाना होगा |  

बुधवार, 19 जून 2013

अपना यार करता है




नहीं करता जो  दुश्मन  भी,वो मेरा यार करता है |
झुका कर शोख नज़्ररों को,जिगर पर वार करता है |
मुझे मालूम है ये सबकुछ,मगर ये बात दिल की है,
अजब  शै   है ये मेरा दिल, उसी से प्यार करता है |
हमेशा की तरह् वादा , न आएगा वो शबभर फिर,
जगा कर रात भर हमको, सुबह तकरार करता है |
खता हमसे हुई कैसी,लगा बैठे हैं दिल उससे,
जो इज़हारे मुहब्बत से,सदा इन्कार करता है |
मैं जब-जब फूल चुनता हूं,चढ़ाने के लिये उसपर,
चुभोने को वो कांटों की,  फसल तैय्यार करता है |
ये कैसा प्यार है हरदम,मचलता है सताने को,
फसाने में मुहब्बत के, नहीं इकरार  करता है |
अकीदा किस कदर मुझको,मुहब्बत पर मेरे दिल की,
जो इतनी ठोकरें खाकर, यकीं हर बार करता है |
मुझे मालूम है यह भी,करूं क्या"राज"इस दिल का,
जो महरूम-ए-वफा उससे,वफा दरकार करता है |


शुक्रवार, 14 जून 2013


  रखता हूँ मै

मंजिल-ए-मकसूद तक, रस्ते खुले रखता हूँ मै |
जीत के अपने जिगर में, जलजले रखता हूँ मै |
जोड़ना सम्बन्ध सबसे, ये शगल मेरा नहीं,
जोड लेता हूँ तो फिर, रिश्ते भले रखता हूँ मै |
आँख से आँखे मिला, जानकर दिल का लिखा,
हो अगर इंसानियत तो,सिलसिले रखता हूँ मै |
प्यार का मारा मुझे, मिलता है कोई प्यार से,
दोस्ती कर के हमेशा , दिल मिले रखता हूँ में |
है ये कुदरत की अमां या माँ का आशीर्वाद है,
हर भलाई के जहन में, वलवले  रखता हूँ मै |
बेवजह रिश्ते किसी से, जोड़ता है कब कोई ,
गमजदा से 'राज' अपने , मरहले रखता हूँ मै |

गुरुवार, 13 जून 2013

माँ 





                  
दाता भी माता से बढ कर, अहसान नहीं कर सकता है |
जो मां करती वह कोई भी, इन्सान नहीं कर सकता है |
ना टूटे निंदिया बच्चे की, मां रात-रात भर जगती है,-
गीले में सोकर नींदों को, कुरबान  नहीं  कर सकता है |
बच्चे पर संकट दिखे जरा, मां खेल जान पर जाती है,-
कोई इस खातिर खतरे में, निजप्राण नहीं कर सकता है |
ठोकर लग जाए बच्चे को, माता का दिल हिल जाता है,-
बच्चे की पीड़ा का कोई, यह ध्यान नहीं कर सकता है |
सौ बार पुकारे "मां" बच्चा,  मां दौड़-दौड़ आ जाती  है,-
माता के जैसा ऐसा भी, संज्ञान  नहीं कर सकता  है |
आंखों से बच्चा हो ओझल,विचलित हो करने लगे दुआ,-
इतनी ममता का कोई भी,प्रतिदान नहीं कर सकता है |
मां को इन सब के बदले में, संघात करे संतान अगर,-
बददुआ नहीं दे 'राज' कभी, इन्सान नहीं कर सकता है |


आनन देखा है


आनन देखा है





आनन देखा है

हे प्रियतम तुमने बसंत में,क्या अपना आनन देखा है |
सत्य कहो इस आनन जैसा,क्या मह्का मधुवन देखा है |
हूक उठीहै कभी हृदयमें,एक अजब सी प्यास जगी क्या,
इस बसंत की किसी रात में,निज मन का नर्तन देखा है |
रिमझिम वर्षा इन्द्र्धनुष से, एकनई अनुभूति जगाकर,
काजल सी घनघोर घटा में,सन्-सन् करता तन देखा है |
रस बरसाते पूर्ण चन्द्र ने, कभी नहीं क्या मधु बरसाया,
उस मधु से सिंचित परियों सा,क्या अपना यौवन देखा है |
आह् शिशिरके हिमपातोंने,असर नहीं क्या तुमपर डाला,
सर-सर चलती शीतपवन में,क्या जलता तनमन देखा है |
"राज"तृषित नयनोंसे अपलक,तुमको अविरल देख रहा है,
करुणकथा सा कुसुमित् उसका,क्षुधित हृदयक्रंदन देखा है | 

बुधवार, 12 जून 2013

"दिखाओ दर्द-ए-दिल हमको"

नहीं कम उम्र हैं फिर भी
निराली हैं जिदें उनकी 
किये जिद कल से बैंठे हैं 
दिखाओ दर्द-ए-दिल हमको...!
डॉ.राज सक्सेना

मै जिन्दा रह सकता हूँ

मौलिक एवं अप्रकाशित
मै जिन्दा रह सकता हूँ
         -डा.राज सक्सेना
तपती धरती,तपता अम्बर,मैं हंसता  सह सकता हूं |
इन दोनों के बीच में तप कर,मैं जिंदा रह सकता हूं |
जिन से मेरे दिल के रिश्ते, देस गए तो भूल गए,
गैरों को परदेस में कैसे, मैं  अपना कह सकता हूं |
खुशियां बांटीं गैरों को भी, रख कर दोनों हाथ खुले,
अब तो गम के साथ खुशी से,मैं यकसाँ रह सकता हूं |
औरों को लुटता देखा पर , परदेसी से प्यार किया ,
मरने तक का रोग लगा कर,मैं हंसता रह सकता हूं |
मुझे डरा कर, पास से मेरे,कई बार गुज़री है मौत,
हर क्षण उसके पांव की चापें,मैं सुनता रह सकता हूं |
एक बुलबुला-जीवन पल का,है जीवन का सार यही,
देख वक्त के हाथ मैं किस्मत,मैं तकता रह सकता हूं |
घटाटोप अंधियारों में भी, यादों के कुछ दीप जलाकर,
'राज' इन्ही यादों के बल पर,मैं ज़िन्दा रह सकता हूं |
  मो.- 09410718777- 7579289888- 8057320999
इन्हें भी अवश्य देखें (ब्लाग)
bal sahityiksahchar, sahityiksahchar (hasya-vyangy)

मंगलवार, 11 जून 2013

आडवाणी पुराण

 आडवाणी-पुराण  

अडवाणी ने भीष्म बन,चला दिया ब्रह्मास्त्र |
सीखों का लम्बा स्वयं,खोलदिया हर शास्त्र |
खोल दिया हर शास्त्र, नफ़ीरी अलग  बजाते,
सबको लेकर चलो साथ, यह मन्त्र बताते |
कहे'राज' कवि,अधिक उम्र में सोच अजानी,
बाबर - ढांचा विध्वंस,  भुला बैठे अडवाणी ?
-०-
भजन - कीर्तन उम्र में, ले  सत्ता का ख्वाब |
मिटटी सबकी जानकर, करते फिरें खराब |
करते  फिरें  खराब,  प्रैस  में  सब  ले जाते,
घातों के हथियार,नवल  नित उन्हें थमाते |
कहे'राज'कवि, मातम धुन पर भंगड़ानर्तन,
घर  पर  पड़े  अकेले,  रोते  करते  क्रन्दन |
-०-
उम्र और  इतिहास का,  कुछ तो रखो ख्याल |
दादा  बन सबकुछ किया,इसका नहीं मलाल |
इसका  नहीं  मलाल,  उठा भगवा रंग परचम ,
लौह-पुरुष बन इतरा  रथ पर , चलते हरदम |
कहे 'राज' कवि, चौथे-पन क्या जिन्ना होना,
ले  डालो  सन्यास, बंद करो  यह  रोना धोना |
-०-

सोमवार, 10 जून 2013

समीक्षा - सुवर्ण चम्पा

               समीक्षा - सुवर्ण चम्पा
                           -डा.राज सक्सेना
             सुवर्ण चम्पा समीक्षा हेतु प्राप्त हुआ | पैकेट खोला तो मुख पृष्ट सामने था | विश्वास नहीं हुआ कि
किसी एक उम्रदार चेहरे से भी कोई मुखपृष्ट इतना सुंदर बनाया जा सकता है | सच तो यह है कि मुखपृष्ट  का -
अवलोकन कर के ही ग्रन्थ को खोल कर पढने की उत्कंठा  अंगडाईयां  लेने लगे, तो यह है सम्पादक द्वै डा.नरेंद्र शर्मा 'कुसुम' और श्री कृष्ण शर्मा जी की सम्पादन क्षमता का पहला शानदार आयाम | अस्तु ! गजल के अनुरूप - आंतरिक पृथम पृष्ट पर राधा कृष्ण का युगल चित्र सोने में सुहागा बन कर उभरता है  | यह है सम्पादक द्वै की  -लगातार दूसरी सफलता का अनुपम आयाम जो पन्ने पर पन्ने पलटने के लिए पाठक को विवश ही नही करताआनन्द स्फुरण की सरिता का अविकल संवहन भी करता है | और इसके पश्चात प्रारम्भ होता है चोटी के अनेक साहित्य पुरोधाओं का सुवर्ण चम्पा पर उनके व्यक्तिगत आग्रहहीन मन्तव्यों का एक लम्बा सिलसिला | अक्सर -इस तरह के मन्तव्य उबाऊ और नीरस होते हैं | किन्तु इतने लम्बे मन्तव्य सिलसिले को नीरसता के अंध कूपसे, बिना काजल की कोई रेखा लगने देने से बचा कर, इस तरह से क्रम देकर पठनीय और सरस बनाया जा  -सकता है, इस कल्पनीय कला को साकार रूप देने में भी सम्पादक द्वै ने अपनी विशेषज्ञता सिद्ध की है | यह है -
सम्पादन सफलता की अनवरत सफलता की अगली कड़ी |
            इस अनुपम ग्रन्थ की अगली कड़ी प्रारम्भ होती है चौरड़िया जी के समग्र गजल और अंतर -संबंधित मुक्तकों आदि के एक सुगठित,समन्वित और सम्पादन क्षमता से परिपूर्ण काव्यमय गुलदस्ते के शानदार समुच्चय के रूप में | यहाँ भी सम्पादक द्वै ने अकबर इलाहाबादी के दो बेहद प्रसिद्ध शेअरों से , जो गुलदस्ते की एकजुटता के लिए बाँधी गई डोरी का काम करते हैं, की है | मुलाहिजा फरमाएं -
         अल्लाह ने दी है जो तुम्हें चाँद सी सूरत,
         रौशन भी करो जाके सियहखाना किसी का |    और -

         दूर से आए थे साक़ी सुनके मैखाने को हम,
         बस तरसते ही चले अफ़सोस पैमाने को हम |     क्या बात है |
             
         चौरड़िया जी का गजल समग्र प्रारम्भ होता है 'जरा तुम चलो, जरा हम  चलें' से |  इस
शानदार गजल से  चौरड़िया जी को  जिन्दगी के शानदार फलसफे   -
          किसी मोड़ पर यूँ ही बेसबब,
          कभी हम मिले, कभी तुम मिले |
          चले 'अश्क' यूं ही  रात दिन,
          यहाँ    जिन्दगी   के  काफिले |   
के साथ समग्र में प्रवेश दिलाया गया है | इसी
प्रकार एक से बढ़ कर एक गजल का चयन जहाँ एक ओर सम्पादन क्षमता का प्रदर्शन करता है,
वहीं दूसरी ओर चौरड़िया जी की गजलगोई पर जानदार अदबी पकड़ को अनायास सामने लाकर रख
देता है |
             अंदर के पन्नों पर विभिन्न भावपूर्ण साहित्यिक गजलों का नाना फूलों से सजा - गौरवमय गुलदस्ता इस प्रकार रखा गया है कि पाठक मंत्रमुग्ध सा पन्ने पर पन्ने पलटने को मजबूर होता चला चला जाता है और गजल के वजन और श्रंगारिक क्षमता का कायल होता चला जाता है |जहाँ तक मेरा प्रश्न है | मै तो चौरड़िया जी की अद्भुत गजलगोई और प्रत्येक दृष्टिकोण से सम्पूर्ण अदबी गजलों का कायल हो गया हूँ | अगर पाठक मन से समग्र का वाचन करे तो निश्चित रूप से उसे एक
अलौकिक आनन्द आएगा ऐसा मुझे विश्वास है |
             गजलों के बाद गीत और गद्य गीतों का एक काफिला पाठक को बांधे रखने में सफलता का आयाम बनाता चलता रखने में भी सम्पादक द्वै पूर्णतया सफल रहे है |
           इसके बाद प्रारम्भ होता है मुक्तक का क्रम कविवर रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों से -
           और वक्ष के कुसुमकुंज, सुरभित विश्राम भवन ये,
           जहाँ मृत्यु के पथिक ठहरकर श्रान्ति दूर करते है |  
और अकबर इलाहाबादी के इस शेयर केॉ साथ -
           हम जान से बेजार रहा करते हैं अकबर,
           जब से दिले बेताब दीवाना है किसी का |
           इसे सम्पादन का सुंदर संकलन न कहा जाय तो क्या कहा जाय |शायर अश्क का कता/रुबाई के क्षेत्र में स्पष्ट दखल का उदाहरण देखें-
           साकिया जाम पिला दे मुझको,
           प्यासा मरता हूँ जिला दे मुझको |
           कसम खाई थी ऊपरी दिल से,
           कसम का यों न सिला दे मुझको | 
और फिर एक से बढ़ कर मुक्तकों की झमाझम का एक
अटूट सिलसिला पाठक को पृष्ट पर पृष्ट पलटने पर मजबूर करता रहता है |
           अब आता है अंत में अशआर और माहिया का एक लम्बा मगर दिलचस्प सिलसिला, एक -
शेयर 'अज्ञात' तथा नीरज जी की दो पंक्तियों के साथ -
           साक़िया तेरी नजर की लाज रखने के लिए,
           होश में होते हुए बेहोश हो जाना पड़ा  |      
तथा-
         
           देखती ही रहो प्राण दर्पण न तुम,
           प्यार का ये महूरत निकल जाएगा |    
से अंगडाई लेकर किसी हसीना के यौवन स्तूप सा
अचानक सामने आकर पूरा शरीर झनझनाने लगता है | अशआर पर अश्क जी की पकड़ का एक नमूना देखें-
           दोस्त इस दुनिया में कोई, दूसरा होता नहीं,
           हो गए है सब जुदा पर गम जुदा होता नहीं |    
इसे गागर में सागर न कहें तो क्या कहें |
           इसके बाद सम्पादक द्वै ने फिर से मंतव्यों की गंगा जमुनी महफिल मंतव्यों के पद्य और गद्य के रूपों से सजा दी है | इस कड़ी का अंत होता है सम्पादक द्वै में से एक आ.श्री कृष्ण शर्मा जी के बहुआयामी आलेख 'गजल और गीत को न्यौछावर है हर सांस' से | अंतिम कड़ी में तो शर्मा जी ने अश्क जी के जीवन -परिचय के साथ-साथ उनके समग्र में उपलब्ध सारे रत्न रूपी सितारों को सजा कर ही प्रस्तुत कर दिया है | क्या
बात है | आलेख जहाँ लेखक की अद्भुत लेखन क्षमता का परिचायक है वहीं अश्क जी के प्रति लेखक के अनन्य स्नेह और आदर का भी | साधुवाद |
           इस ग्रन्थ को और संग्रहणीय  तथा स्तरीय बनाने के लिए सम्पादक द्वै ने अश्क जी के सम्मानों की प्रतिलिपियों और उनके पारिवारिक अन्तरंग क्षणों के चित्रों की चित्र कथा का स्वरूप भी पाठको को परोस कर
उनकी जिज्ञासा का शमन ही नहीं किया है | ग्रन्थ को सार्थक भी बनाने का भगीरथ कार्य किया है |
           एक हर दृष्टि से सम्पूर्ण ग्रन्थ के विषय मै और क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा है | इस मील के पत्थर को साहित्य जगत, विशेष रूप से गजल साहित्य संसार जगत में एक ऊंचा स्थान मिलेगा ऐसा मुझे पूर्ण
विश्वास है |
          चलते-चलते ग्रन्थ पर अपनी सार टिप्पणी -
               सुनाना हाल-ए-दिल था बस,बयां आंखों ने कर डाला ,
                  मुहब्बत के फसाने   को,  ज़ुबां  से  कब  कहा किस ने |
और अंत में एक शेअर अश्क जी को समर्पित करते हुए विदा-
             कुछ लोग तो पल भर में,जीते हैं ज़िन्दगी को  ,
                  कुछ लोग सौ बरस में,पल भर भी नहीं जीते |    
सचमुच अश्क जी ने पल भर में पूरी -जिन्दगी को जी लिया है |          
 सम्पर्क - धनवर्षा, हनुमान मन्दिर, खटीमा- 262 308 (उ.ख )
               मो- 09410718777          

शनिवार, 8 जून 2013

कैसे सुलझे ये कठिन पहेली

    कैसे सुलझे ये कठिन पहेली
                             -डा.राज सक्सेना
       जब से मैंने अण्डमान यात्रा की है,एक यक्ष-प्रश्न मेरे सम्मुख सदैव नाचता रहा है | काव्य-शास्त्र में रुचि रख्नने वाला हरएक साहित्यप्रेमी काव्य की गहराई तक घुसकर छंद,शेर,मुक्तक,गीत या कविता में गहराई तक जाकरनिहितार्थ समझता है या फिर समझने का प्रयास करता है तभी उसे उसमें -आनन्द आता है या फिर  यूं कहें कि कविता की सम्पूर्णता या उसके किसीअंश का व्याख्या की कसौटी पर खरा उतरना ही उसके रस या आनन्द   कीसीमायें निर्धारित करता है | किन्तु कभी-कभी अपवाद स्वरूप गलत उदाहरण और मानक की ,वस्तुस्थिति से अनभिज्ञता या जानबूझ कर ध्यान न -देने की प्रवृति अथवा गहनता पर बल न देने से कोई काव्यांश सम्पूर्ण काव्य-कसौटी पर बिना परखे ख्याति के चरम छूकर अमर हो जाता है | ऐसे ही -एक सुविख्यात उर्दू(अब तो हिन्दी का भी)शेर ने मेरा ध्यान आकर्षित किया |मेरी कसौटी पर शेर आलंकारिक उदाहरण पर कहीं नहीं ठहरता |
          मैं  कोई -विद्वान समीक्षक या भाषा विशेषज्ञ नहीं हूं किन्तु कलमकार होने के कारणमुझे एक शेर में कुछ कमी अखरी है जो मैं विद्वानों की अदालत में रख रहाहूं कि इस पर विस्तृत चर्चा हो और अगर कोई भ्रम की  स्थिति है तो उसकासमापन हो सके या संज्ञान लिया जा सके | आइये आते हैं उस शेर पर- 
हममें से शायद हर एक व्यक्ति ने किसी चौराहे,सड़क या मैदान -
पर किसी मजमे वाले से यह शेर जरूर सुना होगा-
        'शोर-ए-दरिया से ये कहता है,समन्दर का सुकूत  ,
        जिसमें जितना जर्फ है,उतना ही वो खामोश है |'
              इस शेर में मुझे तीन चीजें सही नहीं लगीं- शोर-ए-दरिया और समन्दर का सुकूत(सुकून) प्रथम पंक्ति में तथा द्वितीय पंक्ति मे जितना जर्फ है,वो खामोश है |
                       ऊपर मैंने अपनी अण्डमान यात्रा का संदर्भ दिया है | अब मैं उसी सन्दर्भ पर आता हूं | वह एक राजकीय यात्रा थी जो समुद्र को नजदीक से देखने तथा समुद्री यात्रा का पूर्ण आनन्द लेने के लिये जहाज से की गई थी | इस यात्रा में समुद्र में आने-जाने की यात्रा में एक -सप्ताह समुद्र के मध्य रह कर उसे पूरी तरह समझने का मौका मिला |एक नया अनुभव था | जो इस शेर की व्याख्या की पृष्ठ भूमि बना |
                  अब से कोई दो माह पहले समुद्र-यात्रा के संस्मरण लिखते हुए समुद्र की पृकृति को दोहराने पर इस शेर की खामियों पर नजर गईउपरांकित खामियां महसूस हुईं | आइये संदर्भ लें - सबसे पहले 'शोर-ए-दरिया से प्रारम्भ करें | आपने बड़े-बड़े दरिया (नदियां)देखे होंगे | कितनी भी बड़ी नदी हो उसमें कितनी - लहरें उठती हों अगर वह पर्वतीय क्षेत्र मे नहीं बह रही है तो उसमे लगभग न के बराबर शोर होता है | अपवाद हो सकता है जो मेरी जानकारी में नहीं है |
          अब बात करें 'समन्दर में सुकूत(सुकून)' की | मैंने गोवा छोड़कर पूरे देश के समुद्रतट देखे हैं | मुझे कहीं भी भारतीय समुद्रतट शांत नजर नहीं आया | न द्वारिका में,न रामेश्वरम में,न दमण में,न चेन्नैई में और न हावड़ा में | बेहद शोर लहरों के सर पटकने से होता है जिसे शांति या सुकून तो हरगिज नहीं कहा जा सकता | यहां भी वही कहना चाहूंगा अपवाद हो सकता है जो मेरी जानकारी में नहीं है |
                समुद्र को नजदीक से देखने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि समुद्र कितना अशांत,बेचैन और उन्मत्त होता है | उसकी तुलना किसी भी दशा में किसी भी शांत वस्तु(दरिया) नदी से करना उचित या न्या- योचित प्रतीत नहीं होती है |समुद्र के मुकाबले नदी हजार गुना शान्त - होती है | मान लिया कि काव्य में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग - कविता का सौन्दर्य द्विगुणित करता है किन्तु यह इस शेर की विडम्बना
है कि इसमे धुर विरोधी उदाहरण का प्रयोग किया गया है जो काव्यशास्त्र की परम्पराओं के सर्वथा प्रतिकूल है |
       इस परिप्रेक्ष्य में इस के प्रतिवाद में मैने एक शेर अर्ज किया है| अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-
       'कौन कहता है समन्दर में सुकूत-ओ-चैन है,
       देखिये नजदीक जाकर हद तलक बेचैन है |'
क्या यह शेर इस प्रचलित शेर का सटीक प्रतिवाद करने में सक्षम है? यह विद्वानों के परीक्षण का बिषय है |
                     अब आइये शेर की दूसरी पंक्ति की ओर चलते हैं | समुद्र को जर्फ ( जिसका शाब्दिक अर्थ बर्तन,सहनशीलता या समा लेने की -शक्ति होता है ) से जोड़्ते हुए शायर ने बडे व्यक्ति की समा लेने या
सहन कर लेने की शक्ति को बड़ा बताया है |यह भी हर देखने वाला जानता है कि समुद्र आकार में बड़ा
होने के कारण किसी भी दशा में नीरवता का प्रतीक नहीं हो सकता है |वह तो स्वंय बदमस्ती की दशा तक उन्मत्त तथा विध्वंसक है |
         अपनी सीमा (जर्फ) में पैर तक रख लेने वाले जीव को उखेड़ देने तक के लिये उद्ध्त सागर कितना कर्णभेदी शोर करता है यह हर भुक्त भोगी अनुभव कर चुका है | जहाज पर यात्रा करने वाले बहुत
अच्छी तरह से जानते हैं कि चलता या खड़ा जहाज या उसमें बैठे  या खड़े जीव समुद्र की उन्मत्तता और शोर के कारण कितना प्रताड़ित होते हैं | बिना कुछ पकड़े खड़ा होना या बिना चिल्ला कर बोले आवाज तक
नहीं सुनाई देती है | ऐसे बदमस्त को जर्फ के कारण खामोश घोषित कर देना कहां का न्याय है | क्या यही काव्य शास्त्र की कसौटी है |
           आइये इस सन्दर्भ में मेरा एक शेर देखिए-
           'कह दिया किसने समन्दर जर्फ से खामोश है ,
          देखिये साहिल पे जाकर,किस कदर मदहोश है |'
           यह शेर भी मैं समीक्षकों को समर्पित करता हूं कि वे इस शेर का भी हर पहलू से परीक्षण करके इसकी कमियों  को  जनसाधारण के सम्मुख रखें |
           इस परिप्रेक्ष्य में मैने तो अपना  दृष्टिकोण सम्मानित विद्वान समीक्षकों के सम्मुख रखने का दुःसाहस कर दिया है | देखिये इस प्रकरण में वे क्या व्यवस्था देते हैं |
           और चलते-चलते इसी संदर्भ में जर्फ पर एक और शेर मुलाहिजा फरमाएं-
           'अभी से आंख में आंसू,ये कैसा जर्फ है साकी,
          अभी तो दास्तान-ए-गम शुरू भी की नहीं हमने |'
           अभी तो यह इब्तिदा है | आगे का सफर अभी बाकी है |
                                                  -धनवर्षा, हनुमान मन्दिर
                              खटीमा-262308 (उ०ख०)
                             मो०-09410718777

शनिवार, 1 जून 2013

                        -डा.राज सक्सेना
एक अजाना भय, मनो-मस्तिष्क के ऊपर  तना है |
देखना और बोलना, इस कालक्रम में सब मना है |
चुप रहो,  बोलो  नहीं,   चुपचाप  सब   सहते  रहो,
होंठ हिलने मात्र से  ही,  जीभ  कटने की सज़ा है |
इन उजालों से हमें क्या,  कोठियों  के   दास सब,
भाग्य में  हम झोपड़ों के, नीम-अंधियारा लिखा है |
मुस्कुराने   का  ज़रा  भी हक  नही,  मातम करो,
आज  ही  'सरकार'  के, 'दरबान का कुत्ता' मरा है |
बे - रोक सड़कों पर चले, 'सरकार'  लेकर   क़ाफ़िले,
कल से सड़कों पर  हमारा,   दोस्तो चलना मना है |
योजना  नित मधु - मयी, 'नेता' दिखाते  हर कहीं,
धनहरण का योजना में,हरकदम पर सिलसिला है |
जन - हितों पर फैसले, संसद   में  अब होते नहीं,
'पर कतर दो आम-जन के', ये बहस का मुददआ है |
खून कब, अब तो दिलों में, 'राज'  बस  आक्रोश है,
जल्द  उमड़ेगा  सड़क  पर,  दिख रही सम्भावना  है |
   सम्पर्क-हनुमानमन्दिर,खटीमा- 262308 (उ.ख.)
               mo.-09410718777