रविवार, 6 जनवरी 2013

संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ


संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ
                                                          - डा.राज सक्सेना
           अधिकतर विदेशी और कुछ देशवासी भी इसे विडम्बना मानते हैं कि भारतीय
संस्कृति में इतनी विभिन्नताओं के बावजूद इतनी एकात्मता कैसे है?| विभिन्न मतभिन्नता
पूरे देश को एक सूत्र में कैसे बांध देती है | प्राकृतिक,वैचारिक और धार्मिक विश्वासों की वि-
भिन्नताओं के रहते सब लोग एकता के गठबन्धन में कैसे बंधे रहते हैं?|
                  भारत के ऋषि-महर्षियों और मनीषियों ने भरतभूमि के इतने बड़े खण्ड जिसे
उपमहाद्वीप की संज्ञा स्वतः प्राप्त हो चुकी है को एक सूत्र में बांधने और विभिन्न राजनैतिक
इकाइयों में बंटे होने के बावजूद देश की सांस्कृतिक एकता अक्षणु रखने के लिए हिन्दू मता-
वलम्बियों के पारस्परिक सम्मिलन से उन्हें एक बनाए रखने की परिकल्पना को धार्मिक आ-
वरण में अनिवार्यता प्रदत्त करके अपनी श्रेष्ट सामाजिक सोच का प्रमाण दिया है | एकसूत्रता
के उद्देश्य से इस प्रकार की परिकल्पना जो देश के विभिन्न चार  स्थानों पर बारह वर्ष के-
अन्तराल पर सांस्कृतिक समागम के लिये की गई हो अन्यत्र किसी धर्म या वर्ग में उपलब्ध
नहीं है | इतना ही नहीं लम्बे अन्तराल को कुछ कम करने के सद्प्रयास के रूप में इसे -
अर्द्ध-कुम्भ का स्वरूप प्रदान कर दिया गया | जिससे यह अनिवार्य रूप से चारों स्थानों में
छै;वर्ष के उपरान्त किन्तु एक चक्र के बाद हर तीन वर्ष के बाद देश में निर्धारित किसी भी
स्थान पर होता है और इस प्रकार देश के चार धामों,बारह ज्योतिर्लिंगों और इक्यावन शक्ति-
पीठों के रूप में एकता के कारक, उत्प्रेरक या केन्द्र जो भी कहा जाय का पर्याय बन कर देश
को,भारतीय संस्कृति को एक बनाए रखता है | यहां पर हम प्रत्यक्ष पाते हैं,भारतीय मनीषियों
और नीति नियन्ताओं की महान और दीर्घगामी सोच की प्रबल पारिणति के रूप में भारत की
एकात्मता का एक सूत्र |
                    कुम्भ वास्तव में निर्धारित तिथि,निर्धारित नदी, निर्धारित स्थान और निर्धा-
रित अवधि में होने वाले स्नान का नाम है | जिसे करना एक हिन्दू का अनिवार्य कर्म है |
इसकी अनिवार्यता और इस बहाने देश के विभिन्न अंगों के वासियों का विराट सम्मेलन ही
देश की संस्कृति की एकात्मता और अखण्डता का माध्यम बनता है |
                   कुंभ की मूल कथा समुद्रमंथन के समय प्राप्त अमृत-कुंभ(घट या घड़ा)  से
सम्बद्ध है | आख्यान है कि देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र-मंथन के सामुहिक अनुष्ठान से
समुद्र से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए उनमें एक अमृत-घट भी था | अमृत-घट को राक्षसों ने -
हस्तगत कर लिया | उनसे युक्तियुक्त तरीके से देवताओं ने घट प्राप्त कर पृथ्वी पर जिन -
चार स्थानों पर रखा वे स्थान थे- हरिद्वार(उत्तराखण्ड),प्रयाग(उत्तर प्रदेश),उज्जैन(मध्यप्रदेश्)
और नासिक(महाराष्ट्र)|  माना जाता है कि इन स्थानों पर अमृत-घट रखने से उसमें से कुछ
बूंदें छलक कर गिरीं और ये स्थान अमृतमय हो गए | यह भी एक सत्य है कि इन तिथियों
का खगोलीय ऋतु परिवर्तन और ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति भी इन स्थानों पर कुम्भ के -
रूप में सम्पूर्ण भारतीय समाज के सम्मिलन की विशिष्टता बनती है | स्कन्धपुराण के अनुसार
भी कुंभ पर्व ज्योतिष गणित पर आधारित पर्व है |जब सूर्य मेष राशि पर आए और वृहस्पति
कुंभ राशि पर हो तो हरिद्वार में गंगा मे स्नान का कुंभयोग बनता है | प्रयाग में गंगा-यमुना
के संगम पर सूर्य मकर राशि पर और वृहस्पति बृष राशि पर हो इस संयोग का माघ माह में
पड़ना आवश्यक होता है | इसी प्रकार निर्धारित तिथि को निर्धारित ग्रह-स्थिति में नासिक में
नर्मदा पर कुम्भ होता है किन्तु क्षिप्रा तट पर उज्जैन में होने वाले कुंभ में बड़ी जटिल स्थिति
है, इसके लिए दस योग का होना आवश्यक है-वैशाख मास,शुकल पक्ष,पूर्णिमा,मेष राशि का
सूर्य,सिंह राशि पर वृहस्पति,तुला राशि पर चन्द्रमा,स्वाति नक्षत्र,व्यतिपात योग और उज्जयिनी
का क्षिप्रातट | इन में से एक भी कम होने पर यह तब होता है जब सिंह् राशि पर सूर्य और
वृहस्पति,पूर्णिमा तिथि और गुरूवार हो |
                कुंभ लगभग तीन माह के विराट सांस्कृतिक व धार्मिक सम्मिलन की विराट
प्रक्रिया का नाम है | प्रारम्भिक,मुख्य और अंतिम स्नान के मध्य लगभग तीन माह का
समय निर्धारित होता है जिसमें भारतीय उपखण्ड के अतिरिक्त विदेशों से आए हुए श्रद्धालु -
और पर्यटक महीनों नदी तट पर आवास कर धार्मिक कृत्य करते हैं | नदी तट पर कई-
कई किलोमीटर लम्बे चौड़े झोपड़ियों के नगर बस जाते हैं | बड़े-बड़े आलीशान शामियाने
व लग्जरी तम्बू खड़े हो जाते हैं | अस्थाई सड़कें,पुल और अन्य नागरिक सुविधाओं  की
अस्थाई व्यवस्थायें शासन कर देता है तथा शांति व्यवस्था तथा जनस्वास्थ्य के लिए तो
अति विशिष्ट सुविधाओं का प्रवन्ध हो जाता है |
               इस वर्ष प्रयाग में होने वाले कुंभ का मुख्य स्नान चौदह जनवरी मकर संक्राति
को हो रहा है तथा अंतिम स्नान दस मार्च महाशिवरात्रि को निश्चित है | इन स्नानों को -
शाही स्नान कहा जाता है | इस बार दूसरा स्नान सत्ताईस जनवरी पौष पूर्णिमा,तीसरा स्नान
दस फरवरी मौनी अमावस्या तथा चौथा स्नान पन्द्रह फरवरी बसन्त पंचमी को पड़ रहा है |
               कुंभ के पवित्र योग पर सर्वप्रथम स्नान का अधिकार विशिष्ट नागा अखाड़ों को ही
प्राप्त है | इनके स्नान के उपरान्त ही जनसाधारण को स्नान का अधिकार मिलता है | भारत
में संन्यासियों के अखाड़ों की परम्परा जनश्रुतियों और इतिहास अथवा पुराणों में उल्लिखित-
आख्यानों के अनुसार काफी पुरानी है | प्राचीन काल में और अंग्रेजों के समय भी उनके अधीन
राजामहाराजाओं के शासन काल में इन नागाअखाड़ों की अपनी लगभग स्वतंत्र सत्ता होती थी |
बल्कि कहीं-कहीं पर तो इनका स्थानीय शासकों पर सम्पूर्ण अधिकार तक होता था | ऐसे
भी उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं जब इन अखाडों ने जो चाहा वही हुआ | आज भी अखाड़े के
अन्दर इनका अपना शासन ही चलता है |जनश्रुतियो और ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इन
अखाड़ों का इतिहास इस प्रकार प्राप्त होता है-
         नागाअखाड़ों की परम्परा में सबसे प्राचीन 'आवाहन' अखाड़े का इतिहास प्राप्त होता
है | इसकी स्थापना सन 547 में हुई थी | इसकी स्थापना के लगभग एक सौ वर्ष बाद-
सन 647 में अटल अखाड़े का गोंडवाना में जन्म हुआ किन्तु इसका मुख्यालय वाराणसी में
है | सन 855 में आनंद अखाड़ा अस्तित्व में आया तो गुजरात के कच्छ में निरंजनी अखाड़ा
सन 904 में जन्मा | जूना अखाड़ा जिसे भैरवी अखाड़ा भी कहते हैं की स्थापना सन 1060
में उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई | इस अखाड़े की विशेषता यह है कि इस की सदस्य -
महिलाएं भी हो सकती हैं | ये नागा महिलाएं अवधूतनी कहलाती हैं | इसकी शाखाएं हरि-
द्वार, प्रयाग, उज्जैन और त्रयंबक में हैं |  इस अखाड़े में भैरव की पूजा इष्ट है | निरंजनी -
अखाड़े का मुख्यालय हरिद्वार में है | शैव सन्यासियों के अखाड़े निर्वाणी का जन्म तो झार-
खण्ड के कुण्डागढ के सिद्धेश्वर मन्दिर में हुआ किन्तु इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के हरिद्वार
में है | यह अखाड़ा अपने सिद्धमहंतों के लिए प्रसिद्ध है और इसने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिए
शिव की नगरी वाराणसी की सुरक्षा हेतु सन 1664 में औरंगजेब से दो बार युद्ध किया था |
वर्तमान में देश में दशनामी सन्यासियों के भी कई अखाड़े विद्यमान हैं |  
           वस्तुतः नागा अखाड़े हिन्दू धर्म को समर्पित हिन्दुओं के सर्वत्यागी(वस्त्र तक) युवा
सन्यासियों की छावनियां थी जो हिन्दूधर्म पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के
लिए मतावलम्बियों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किए गये थे | कालान्तर में इनके
कई-कई बार (मत वैभिन्नता के कारण) आपस में भी लड़ने का इतिहास रहा है | अकबर के
काल में तो दो अखाड़ों के अकबर द्वारा कराए गए युद्ध का बड़ा सजीव वर्णन 'आईने अक-
बरी' मे मिलता है | अखाड़ों की परम्परा में पिछली शताब्दी में वैष्णव, अग्नि, उदासीन,-
बड़ा उदासीन और निर्मल पंचायत अखाड़ों की स्थापना हुई | अखाड़ों का सदस्य शारिरिक-रूप से
स्वस्थ वही व्यक्ति हो सकता है जो संसार की मोहमाया त्याग कर सन्यास ग्रहण कर चुका हो
और अखाड़ों की परम्पराओं का जान देकर पालन करने के परीक्षणों पर खरा उतरा हो, धर्म के
लिए मर मिटने को तैयार हो |
           कुंभ में उमड़े अपार जन समूह और विभिन्न मत-मतान्तरों की विभिन्न
उप संस्कृतियों को एक स्थान पर एक दूसरे से समन्वय स्थापित करते देखना भी एक -
अलग ही अनुभव है | हिन्दू धर्म में विभिन्न तरीकों से अपनी आस्था के प्रति समर्पित-
मानव जन-समूह निर्जन नदी तट को एक सार्थक धार्मिक महा नगर का स्वरूप प्रदान कर
देता है | जिधर देखो लाखों झोपड़ी,टिन शेड,प्लाईवुड से बने मनमोहक ढांचे और शामियाने-
तम्बू तथा उनमें उमड़ा अपार जनसमूह यह सोचने को विवश कर देता है कि भारत में ही
है कहीं भगवान का निवास | हर अखाड़ा अपने वैभव का खुला प्रदर्शन करता प्रतीत होता
है | हर आगन्तुक भगवान अथवा अपने इष्ट का नाम जपता एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत होता
है, लगता है कि उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के सारे भेद मिट गए हैं |  सारा भारत एक हो-
गया है | विभिन्न मत-मतान्तर और उप-संस्कृतियां एकात्म हो गई हैं | बाकी बची कुछ
दूरियां भी शनैः-शनैः मिट जाएंगी कुंभ की इस अविरल महायात्रा के बारह और छैः वर्षों के
निश्चत अन्तराल में जो, इन चारों स्थानों पर क्रमशः आता है और प्रत्येक किसी स्थान पर
तीन वर्ष के अन्तराल में कुंभ या अर्ध-कुम्भ के रूप में आकर सम्पूर्ण भारत और विदेश में
बसे भारतीयों के मनों और सांस्कृतिक एकात्मता को दस्तक देकर जगा जाता है | विधर्मियों
और विदेशियों को आश्चर्यचकित करने के लिए कि आखिर वह कौन सा तत्व है जो इतने बड़े-
उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधे रखता है ? हिलने भी नहीं देता ?|
सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888      

संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ


संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ
                                                          - डा.राज सक्सेना
           अधिकतर विदेशी और कुछ देशवासी भी इसे विडम्बना मानते हैं कि भारतीय
संस्कृति में इतनी विभिन्नताओं के बावजूद इतनी एकात्मता कैसे है?| विभिन्न मतभिन्नता
पूरे देश को एक सूत्र में कैसे बांध देती है | प्राकृतिक,वैचारिक और धार्मिक विश्वासों की वि-
भिन्नताओं के रहते सब लोग एकता के गठबन्धन में कैसे बंधे रहते हैं?|
                  भारत के ऋषि-महर्षियों और मनीषियों ने भरतभूमि के इतने बड़े खण्ड जिसे
उपमहाद्वीप की संज्ञा स्वतः प्राप्त हो चुकी है को एक सूत्र में बांधने और विभिन्न राजनैतिक
इकाइयों में बंटे होने के बावजूद देश की सांस्कृतिक एकता अक्षणु रखने के लिए हिन्दू मता-
वलम्बियों के पारस्परिक सम्मिलन से उन्हें एक बनाए रखने की परिकल्पना को धार्मिक आ-
वरण में अनिवार्यता प्रदत्त करके अपनी श्रेष्ट सामाजिक सोच का प्रमाण दिया है | एकसूत्रता
के उद्देश्य से इस प्रकार की परिकल्पना जो देश के विभिन्न चार  स्थानों पर बारह वर्ष के-
अन्तराल पर सांस्कृतिक समागम के लिये की गई हो अन्यत्र किसी धर्म या वर्ग में उपलब्ध
नहीं है | इतना ही नहीं लम्बे अन्तराल को कुछ कम करने के सद्प्रयास के रूप में इसे -
अर्द्ध-कुम्भ का स्वरूप प्रदान कर दिया गया | जिससे यह अनिवार्य रूप से चारों स्थानों में
छै;वर्ष के उपरान्त किन्तु एक चक्र के बाद हर तीन वर्ष के बाद देश में निर्धारित किसी भी
स्थान पर होता है और इस प्रकार देश के चार धामों,बारह ज्योतिर्लिंगों और इक्यावन शक्ति-
पीठों के रूप में एकता के कारक, उत्प्रेरक या केन्द्र जो भी कहा जाय का पर्याय बन कर देश
को,भारतीय संस्कृति को एक बनाए रखता है | यहां पर हम प्रत्यक्ष पाते हैं,भारतीय मनीषियों
और नीति नियन्ताओं की महान और दीर्घगामी सोच की प्रबल पारिणति के रूप में भारत की
एकात्मता का एक सूत्र |
                    कुम्भ वास्तव में निर्धारित तिथि,निर्धारित नदी, निर्धारित स्थान और निर्धा-
रित अवधि में होने वाले स्नान का नाम है | जिसे करना एक हिन्दू का अनिवार्य कर्म है |
इसकी अनिवार्यता और इस बहाने देश के विभिन्न अंगों के वासियों का विराट सम्मेलन ही
देश की संस्कृति की एकात्मता और अखण्डता का माध्यम बनता है |
                   कुंभ की मूल कथा समुद्रमंथन के समय प्राप्त अमृत-कुंभ(घट या घड़ा)  से
सम्बद्ध है | आख्यान है कि देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र-मंथन के सामुहिक अनुष्ठान से
समुद्र से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए उनमें एक अमृत-घट भी था | अमृत-घट को राक्षसों ने -
हस्तगत कर लिया | उनसे युक्तियुक्त तरीके से देवताओं ने घट प्राप्त कर पृथ्वी पर जिन -
चार स्थानों पर रखा वे स्थान थे- हरिद्वार(उत्तराखण्ड),प्रयाग(उत्तर प्रदेश),उज्जैन(मध्यप्रदेश्)
और नासिक(महाराष्ट्र)|  माना जाता है कि इन स्थानों पर अमृत-घट रखने से उसमें से कुछ
बूंदें छलक कर गिरीं और ये स्थान अमृतमय हो गए | यह भी एक सत्य है कि इन तिथियों
का खगोलीय ऋतु परिवर्तन और ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति भी इन स्थानों पर कुम्भ के -
रूप में सम्पूर्ण भारतीय समाज के सम्मिलन की विशिष्टता बनती है | स्कन्धपुराण के अनुसार
भी कुंभ पर्व ज्योतिष गणित पर आधारित पर्व है |जब सूर्य मेष राशि पर आए और वृहस्पति
कुंभ राशि पर हो तो हरिद्वार में गंगा मे स्नान का कुंभयोग बनता है | प्रयाग में गंगा-यमुना
के संगम पर सूर्य मकर राशि पर और वृहस्पति बृष राशि पर हो इस संयोग का माघ माह में
पड़ना आवश्यक होता है | इसी प्रकार निर्धारित तिथि को निर्धारित ग्रह-स्थिति में नासिक में
नर्मदा पर कुम्भ होता है किन्तु क्षिप्रा तट पर उज्जैन में होने वाले कुंभ में बड़ी जटिल स्थिति
है, इसके लिए दस योग का होना आवश्यक है-वैशाख मास,शुकल पक्ष,पूर्णिमा,मेष राशि का
सूर्य,सिंह राशि पर वृहस्पति,तुला राशि पर चन्द्रमा,स्वाति नक्षत्र,व्यतिपात योग और उज्जयिनी
का क्षिप्रातट | इन में से एक भी कम होने पर यह तब होता है जब सिंह् राशि पर सूर्य और
वृहस्पति,पूर्णिमा तिथि और गुरूवार हो |
                कुंभ लगभग तीन माह के विराट सांस्कृतिक व धार्मिक सम्मिलन की विराट
प्रक्रिया का नाम है | प्रारम्भिक,मुख्य और अंतिम स्नान के मध्य लगभग तीन माह का
समय निर्धारित होता है जिसमें भारतीय उपखण्ड के अतिरिक्त विदेशों से आए हुए श्रद्धालु -
और पर्यटक महीनों नदी तट पर आवास कर धार्मिक कृत्य करते हैं | नदी तट पर कई-
कई किलोमीटर लम्बे चौड़े झोपड़ियों के नगर बस जाते हैं | बड़े-बड़े आलीशान शामियाने
व लग्जरी तम्बू खड़े हो जाते हैं | अस्थाई सड़कें,पुल और अन्य नागरिक सुविधाओं  की
अस्थाई व्यवस्थायें शासन कर देता है तथा शांति व्यवस्था तथा जनस्वास्थ्य के लिए तो
अति विशिष्ट सुविधाओं का प्रवन्ध हो जाता है |
               इस वर्ष प्रयाग में होने वाले कुंभ का मुख्य स्नान चौदह जनवरी मकर संक्राति
को हो रहा है तथा अंतिम स्नान दस मार्च महाशिवरात्रि को निश्चित है | इन स्नानों को -
शाही स्नान कहा जाता है | इस बार दूसरा स्नान सत्ताईस जनवरी पौष पूर्णिमा,तीसरा स्नान
दस फरवरी मौनी अमावस्या तथा चौथा स्नान पन्द्रह फरवरी बसन्त पंचमी को पड़ रहा है |
               कुंभ के पवित्र योग पर सर्वप्रथम स्नान का अधिकार विशिष्ट नागा अखाड़ों को ही
प्राप्त है | इनके स्नान के उपरान्त ही जनसाधारण को स्नान का अधिकार मिलता है | भारत
में संन्यासियों के अखाड़ों की परम्परा जनश्रुतियों और इतिहास अथवा पुराणों में उल्लिखित-
आख्यानों के अनुसार काफी पुरानी है | प्राचीन काल में और अंग्रेजों के समय भी उनके अधीन
राजामहाराजाओं के शासन काल में इन नागाअखाड़ों की अपनी लगभग स्वतंत्र सत्ता होती थी |
बल्कि कहीं-कहीं पर तो इनका स्थानीय शासकों पर सम्पूर्ण अधिकार तक होता था | ऐसे
भी उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं जब इन अखाडों ने जो चाहा वही हुआ | आज भी अखाड़े के
अन्दर इनका अपना शासन ही चलता है |जनश्रुतियो और ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इन
अखाड़ों का इतिहास इस प्रकार प्राप्त होता है-
         नागाअखाड़ों की परम्परा में सबसे प्राचीन 'आवाहन' अखाड़े का इतिहास प्राप्त होता
है | इसकी स्थापना सन 547 में हुई थी | इसकी स्थापना के लगभग एक सौ वर्ष बाद-
सन 647 में अटल अखाड़े का गोंडवाना में जन्म हुआ किन्तु इसका मुख्यालय वाराणसी में
है | सन 855 में आनंद अखाड़ा अस्तित्व में आया तो गुजरात के कच्छ में निरंजनी अखाड़ा
सन 904 में जन्मा | जूना अखाड़ा जिसे भैरवी अखाड़ा भी कहते हैं की स्थापना सन 1060
में उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई | इस अखाड़े की विशेषता यह है कि इस की सदस्य -
महिलाएं भी हो सकती हैं | ये नागा महिलाएं अवधूतनी कहलाती हैं | इसकी शाखाएं हरि-
द्वार, प्रयाग, उज्जैन और त्रयंबक में हैं |  इस अखाड़े में भैरव की पूजा इष्ट है | निरंजनी -
अखाड़े का मुख्यालय हरिद्वार में है | शैव सन्यासियों के अखाड़े निर्वाणी का जन्म तो झार-
खण्ड के कुण्डागढ के सिद्धेश्वर मन्दिर में हुआ किन्तु इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के हरिद्वार
में है | यह अखाड़ा अपने सिद्धमहंतों के लिए प्रसिद्ध है और इसने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिए
शिव की नगरी वाराणसी की सुरक्षा हेतु सन 1664 में औरंगजेब से दो बार युद्ध किया था |
वर्तमान में देश में दशनामी सन्यासियों के भी कई अखाड़े विद्यमान हैं |  
           वस्तुतः नागा अखाड़े हिन्दू धर्म को समर्पित हिन्दुओं के सर्वत्यागी(वस्त्र तक) युवा
सन्यासियों की छावनियां थी जो हिन्दूधर्म पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के
लिए मतावलम्बियों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किए गये थे | कालान्तर में इनके
कई-कई बार (मत वैभिन्नता के कारण) आपस में भी लड़ने का इतिहास रहा है | अकबर के
काल में तो दो अखाड़ों के अकबर द्वारा कराए गए युद्ध का बड़ा सजीव वर्णन 'आईने अक-
बरी' मे मिलता है | अखाड़ों की परम्परा में पिछली शताब्दी में वैष्णव, अग्नि, उदासीन,-
बड़ा उदासीन और निर्मल पंचायत अखाड़ों की स्थापना हुई | अखाड़ों का सदस्य शारिरिक-रूप से
स्वस्थ वही व्यक्ति हो सकता है जो संसार की मोहमाया त्याग कर सन्यास ग्रहण कर चुका हो
और अखाड़ों की परम्पराओं का जान देकर पालन करने के परीक्षणों पर खरा उतरा हो, धर्म के
लिए मर मिटने को तैयार हो |
           कुंभ में उमड़े अपार जन समूह और विभिन्न मत-मतान्तरों की विभिन्न
उप संस्कृतियों को एक स्थान पर एक दूसरे से समन्वय स्थापित करते देखना भी एक -
अलग ही अनुभव है | हिन्दू धर्म में विभिन्न तरीकों से अपनी आस्था के प्रति समर्पित-
मानव जन-समूह निर्जन नदी तट को एक सार्थक धार्मिक महा नगर का स्वरूप प्रदान कर
देता है | जिधर देखो लाखों झोपड़ी,टिन शेड,प्लाईवुड से बने मनमोहक ढांचे और शामियाने-
तम्बू तथा उनमें उमड़ा अपार जनसमूह यह सोचने को विवश कर देता है कि भारत में ही
है कहीं भगवान का निवास | हर अखाड़ा अपने वैभव का खुला प्रदर्शन करता प्रतीत होता
है | हर आगन्तुक भगवान अथवा अपने इष्ट का नाम जपता एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत होता
है, लगता है कि उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के सारे भेद मिट गए हैं |  सारा भारत एक हो-
गया है | विभिन्न मत-मतान्तर और उप-संस्कृतियां एकात्म हो गई हैं | बाकी बची कुछ
दूरियां भी शनैः-शनैः मिट जाएंगी कुंभ की इस अविरल महायात्रा के बारह और छैः वर्षों के
निश्चत अन्तराल में जो, इन चारों स्थानों पर क्रमशः आता है और प्रत्येक किसी स्थान पर
तीन वर्ष के अन्तराल में कुंभ या अर्ध-कुम्भ के रूप में आकर सम्पूर्ण भारत और विदेश में
बसे भारतीयों के मनों और सांस्कृतिक एकात्मता को दस्तक देकर जगा जाता है | विधर्मियों
और विदेशियों को आश्चर्यचकित करने के लिए कि आखिर वह कौन सा तत्व है जो इतने बड़े-
उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधे रखता है ? हिलने भी नहीं देता ?|
सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888      

संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ


संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ
                                                          - डा.राज सक्सेना
           अधिकतर विदेशी और कुछ देशवासी भी इसे विडम्बना मानते हैं कि भारतीय
संस्कृति में इतनी विभिन्नताओं के बावजूद इतनी एकात्मता कैसे है?| विभिन्न मतभिन्नता
पूरे देश को एक सूत्र में कैसे बांध देती है | प्राकृतिक,वैचारिक और धार्मिक विश्वासों की वि-
भिन्नताओं के रहते सब लोग एकता के गठबन्धन में कैसे बंधे रहते हैं?|
                  भारत के ऋषि-महर्षियों और मनीषियों ने भरतभूमि के इतने बड़े खण्ड जिसे
उपमहाद्वीप की संज्ञा स्वतः प्राप्त हो चुकी है को एक सूत्र में बांधने और विभिन्न राजनैतिक
इकाइयों में बंटे होने के बावजूद देश की सांस्कृतिक एकता अक्षणु रखने के लिए हिन्दू मता-
वलम्बियों के पारस्परिक सम्मिलन से उन्हें एक बनाए रखने की परिकल्पना को धार्मिक आ-
वरण में अनिवार्यता प्रदत्त करके अपनी श्रेष्ट सामाजिक सोच का प्रमाण दिया है | एकसूत्रता
के उद्देश्य से इस प्रकार की परिकल्पना जो देश के विभिन्न चार  स्थानों पर बारह वर्ष के-
अन्तराल पर सांस्कृतिक समागम के लिये की गई हो अन्यत्र किसी धर्म या वर्ग में उपलब्ध
नहीं है | इतना ही नहीं लम्बे अन्तराल को कुछ कम करने के सद्प्रयास के रूप में इसे -
अर्द्ध-कुम्भ का स्वरूप प्रदान कर दिया गया | जिससे यह अनिवार्य रूप से चारों स्थानों में
छै;वर्ष के उपरान्त किन्तु एक चक्र के बाद हर तीन वर्ष के बाद देश में निर्धारित किसी भी
स्थान पर होता है और इस प्रकार देश के चार धामों,बारह ज्योतिर्लिंगों और इक्यावन शक्ति-
पीठों के रूप में एकता के कारक, उत्प्रेरक या केन्द्र जो भी कहा जाय का पर्याय बन कर देश
को,भारतीय संस्कृति को एक बनाए रखता है | यहां पर हम प्रत्यक्ष पाते हैं,भारतीय मनीषियों
और नीति नियन्ताओं की महान और दीर्घगामी सोच की प्रबल पारिणति के रूप में भारत की
एकात्मता का एक सूत्र |
                    कुम्भ वास्तव में निर्धारित तिथि,निर्धारित नदी, निर्धारित स्थान और निर्धा-
रित अवधि में होने वाले स्नान का नाम है | जिसे करना एक हिन्दू का अनिवार्य कर्म है |
इसकी अनिवार्यता और इस बहाने देश के विभिन्न अंगों के वासियों का विराट सम्मेलन ही
देश की संस्कृति की एकात्मता और अखण्डता का माध्यम बनता है |
                   कुंभ की मूल कथा समुद्रमंथन के समय प्राप्त अमृत-कुंभ(घट या घड़ा)  से
सम्बद्ध है | आख्यान है कि देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र-मंथन के सामुहिक अनुष्ठान से
समुद्र से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए उनमें एक अमृत-घट भी था | अमृत-घट को राक्षसों ने -
हस्तगत कर लिया | उनसे युक्तियुक्त तरीके से देवताओं ने घट प्राप्त कर पृथ्वी पर जिन -
चार स्थानों पर रखा वे स्थान थे- हरिद्वार(उत्तराखण्ड),प्रयाग(उत्तर प्रदेश),उज्जैन(मध्यप्रदेश्)
और नासिक(महाराष्ट्र)|  माना जाता है कि इन स्थानों पर अमृत-घट रखने से उसमें से कुछ
बूंदें छलक कर गिरीं और ये स्थान अमृतमय हो गए | यह भी एक सत्य है कि इन तिथियों
का खगोलीय ऋतु परिवर्तन और ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति भी इन स्थानों पर कुम्भ के -
रूप में सम्पूर्ण भारतीय समाज के सम्मिलन की विशिष्टता बनती है | स्कन्धपुराण के अनुसार
भी कुंभ पर्व ज्योतिष गणित पर आधारित पर्व है |जब सूर्य मेष राशि पर आए और वृहस्पति
कुंभ राशि पर हो तो हरिद्वार में गंगा मे स्नान का कुंभयोग बनता है | प्रयाग में गंगा-यमुना
के संगम पर सूर्य मकर राशि पर और वृहस्पति बृष राशि पर हो इस संयोग का माघ माह में
पड़ना आवश्यक होता है | इसी प्रकार निर्धारित तिथि को निर्धारित ग्रह-स्थिति में नासिक में
नर्मदा पर कुम्भ होता है किन्तु क्षिप्रा तट पर उज्जैन में होने वाले कुंभ में बड़ी जटिल स्थिति
है, इसके लिए दस योग का होना आवश्यक है-वैशाख मास,शुकल पक्ष,पूर्णिमा,मेष राशि का
सूर्य,सिंह राशि पर वृहस्पति,तुला राशि पर चन्द्रमा,स्वाति नक्षत्र,व्यतिपात योग और उज्जयिनी
का क्षिप्रातट | इन में से एक भी कम होने पर यह तब होता है जब सिंह् राशि पर सूर्य और
वृहस्पति,पूर्णिमा तिथि और गुरूवार हो |
                कुंभ लगभग तीन माह के विराट सांस्कृतिक व धार्मिक सम्मिलन की विराट
प्रक्रिया का नाम है | प्रारम्भिक,मुख्य और अंतिम स्नान के मध्य लगभग तीन माह का
समय निर्धारित होता है जिसमें भारतीय उपखण्ड के अतिरिक्त विदेशों से आए हुए श्रद्धालु -
और पर्यटक महीनों नदी तट पर आवास कर धार्मिक कृत्य करते हैं | नदी तट पर कई-
कई किलोमीटर लम्बे चौड़े झोपड़ियों के नगर बस जाते हैं | बड़े-बड़े आलीशान शामियाने
व लग्जरी तम्बू खड़े हो जाते हैं | अस्थाई सड़कें,पुल और अन्य नागरिक सुविधाओं  की
अस्थाई व्यवस्थायें शासन कर देता है तथा शांति व्यवस्था तथा जनस्वास्थ्य के लिए तो
अति विशिष्ट सुविधाओं का प्रवन्ध हो जाता है |
               इस वर्ष प्रयाग में होने वाले कुंभ का मुख्य स्नान चौदह जनवरी मकर संक्राति
को हो रहा है तथा अंतिम स्नान दस मार्च महाशिवरात्रि को निश्चित है | इन स्नानों को -
शाही स्नान कहा जाता है | इस बार दूसरा स्नान सत्ताईस जनवरी पौष पूर्णिमा,तीसरा स्नान
दस फरवरी मौनी अमावस्या तथा चौथा स्नान पन्द्रह फरवरी बसन्त पंचमी को पड़ रहा है |
               कुंभ के पवित्र योग पर सर्वप्रथम स्नान का अधिकार विशिष्ट नागा अखाड़ों को ही
प्राप्त है | इनके स्नान के उपरान्त ही जनसाधारण को स्नान का अधिकार मिलता है | भारत
में संन्यासियों के अखाड़ों की परम्परा जनश्रुतियों और इतिहास अथवा पुराणों में उल्लिखित-
आख्यानों के अनुसार काफी पुरानी है | प्राचीन काल में और अंग्रेजों के समय भी उनके अधीन
राजामहाराजाओं के शासन काल में इन नागाअखाड़ों की अपनी लगभग स्वतंत्र सत्ता होती थी |
बल्कि कहीं-कहीं पर तो इनका स्थानीय शासकों पर सम्पूर्ण अधिकार तक होता था | ऐसे
भी उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं जब इन अखाडों ने जो चाहा वही हुआ | आज भी अखाड़े के
अन्दर इनका अपना शासन ही चलता है |जनश्रुतियो और ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इन
अखाड़ों का इतिहास इस प्रकार प्राप्त होता है-
         नागाअखाड़ों की परम्परा में सबसे प्राचीन 'आवाहन' अखाड़े का इतिहास प्राप्त होता
है | इसकी स्थापना सन 547 में हुई थी | इसकी स्थापना के लगभग एक सौ वर्ष बाद-
सन 647 में अटल अखाड़े का गोंडवाना में जन्म हुआ किन्तु इसका मुख्यालय वाराणसी में
है | सन 855 में आनंद अखाड़ा अस्तित्व में आया तो गुजरात के कच्छ में निरंजनी अखाड़ा
सन 904 में जन्मा | जूना अखाड़ा जिसे भैरवी अखाड़ा भी कहते हैं की स्थापना सन 1060
में उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई | इस अखाड़े की विशेषता यह है कि इस की सदस्य -
महिलाएं भी हो सकती हैं | ये नागा महिलाएं अवधूतनी कहलाती हैं | इसकी शाखाएं हरि-
द्वार, प्रयाग, उज्जैन और त्रयंबक में हैं |  इस अखाड़े में भैरव की पूजा इष्ट है | निरंजनी -
अखाड़े का मुख्यालय हरिद्वार में है | शैव सन्यासियों के अखाड़े निर्वाणी का जन्म तो झार-
खण्ड के कुण्डागढ के सिद्धेश्वर मन्दिर में हुआ किन्तु इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के हरिद्वार
में है | यह अखाड़ा अपने सिद्धमहंतों के लिए प्रसिद्ध है और इसने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिए
शिव की नगरी वाराणसी की सुरक्षा हेतु सन 1664 में औरंगजेब से दो बार युद्ध किया था |
वर्तमान में देश में दशनामी सन्यासियों के भी कई अखाड़े विद्यमान हैं |  
           वस्तुतः नागा अखाड़े हिन्दू धर्म को समर्पित हिन्दुओं के सर्वत्यागी(वस्त्र तक) युवा
सन्यासियों की छावनियां थी जो हिन्दूधर्म पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के
लिए मतावलम्बियों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किए गये थे | कालान्तर में इनके
कई-कई बार (मत वैभिन्नता के कारण) आपस में भी लड़ने का इतिहास रहा है | अकबर के
काल में तो दो अखाड़ों के अकबर द्वारा कराए गए युद्ध का बड़ा सजीव वर्णन 'आईने अक-
बरी' मे मिलता है | अखाड़ों की परम्परा में पिछली शताब्दी में वैष्णव, अग्नि, उदासीन,-
बड़ा उदासीन और निर्मल पंचायत अखाड़ों की स्थापना हुई | अखाड़ों का सदस्य शारिरिक-रूप से
स्वस्थ वही व्यक्ति हो सकता है जो संसार की मोहमाया त्याग कर सन्यास ग्रहण कर चुका हो
और अखाड़ों की परम्पराओं का जान देकर पालन करने के परीक्षणों पर खरा उतरा हो, धर्म के
लिए मर मिटने को तैयार हो |
           कुंभ में उमड़े अपार जन समूह और विभिन्न मत-मतान्तरों की विभिन्न
उप संस्कृतियों को एक स्थान पर एक दूसरे से समन्वय स्थापित करते देखना भी एक -
अलग ही अनुभव है | हिन्दू धर्म में विभिन्न तरीकों से अपनी आस्था के प्रति समर्पित-
मानव जन-समूह निर्जन नदी तट को एक सार्थक धार्मिक महा नगर का स्वरूप प्रदान कर
देता है | जिधर देखो लाखों झोपड़ी,टिन शेड,प्लाईवुड से बने मनमोहक ढांचे और शामियाने-
तम्बू तथा उनमें उमड़ा अपार जनसमूह यह सोचने को विवश कर देता है कि भारत में ही
है कहीं भगवान का निवास | हर अखाड़ा अपने वैभव का खुला प्रदर्शन करता प्रतीत होता
है | हर आगन्तुक भगवान अथवा अपने इष्ट का नाम जपता एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत होता
है, लगता है कि उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के सारे भेद मिट गए हैं |  सारा भारत एक हो-
गया है | विभिन्न मत-मतान्तर और उप-संस्कृतियां एकात्म हो गई हैं | बाकी बची कुछ
दूरियां भी शनैः-शनैः मिट जाएंगी कुंभ की इस अविरल महायात्रा के बारह और छैः वर्षों के
निश्चत अन्तराल में जो, इन चारों स्थानों पर क्रमशः आता है और प्रत्येक किसी स्थान पर
तीन वर्ष के अन्तराल में कुंभ या अर्ध-कुम्भ के रूप में आकर सम्पूर्ण भारत और विदेश में
बसे भारतीयों के मनों और सांस्कृतिक एकात्मता को दस्तक देकर जगा जाता है | विधर्मियों
और विदेशियों को आश्चर्यचकित करने के लिए कि आखिर वह कौन सा तत्व है जो इतने बड़े-
उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधे रखता है ? हिलने भी नहीं देता ?|
सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888      

संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ


संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ
                                                          - डा.राज सक्सेना
           अधिकतर विदेशी और कुछ देशवासी भी इसे विडम्बना मानते हैं कि भारतीय
संस्कृति में इतनी विभिन्नताओं के बावजूद इतनी एकात्मता कैसे है?| विभिन्न मतभिन्नता
पूरे देश को एक सूत्र में कैसे बांध देती है | प्राकृतिक,वैचारिक और धार्मिक विश्वासों की वि-
भिन्नताओं के रहते सब लोग एकता के गठबन्धन में कैसे बंधे रहते हैं?|
                  भारत के ऋषि-महर्षियों और मनीषियों ने भरतभूमि के इतने बड़े खण्ड जिसे
उपमहाद्वीप की संज्ञा स्वतः प्राप्त हो चुकी है को एक सूत्र में बांधने और विभिन्न राजनैतिक
इकाइयों में बंटे होने के बावजूद देश की सांस्कृतिक एकता अक्षणु रखने के लिए हिन्दू मता-
वलम्बियों के पारस्परिक सम्मिलन से उन्हें एक बनाए रखने की परिकल्पना को धार्मिक आ-
वरण में अनिवार्यता प्रदत्त करके अपनी श्रेष्ट सामाजिक सोच का प्रमाण दिया है | एकसूत्रता
के उद्देश्य से इस प्रकार की परिकल्पना जो देश के विभिन्न चार  स्थानों पर बारह वर्ष के-
अन्तराल पर सांस्कृतिक समागम के लिये की गई हो अन्यत्र किसी धर्म या वर्ग में उपलब्ध
नहीं है | इतना ही नहीं लम्बे अन्तराल को कुछ कम करने के सद्प्रयास के रूप में इसे -
अर्द्ध-कुम्भ का स्वरूप प्रदान कर दिया गया | जिससे यह अनिवार्य रूप से चारों स्थानों में
छै;वर्ष के उपरान्त किन्तु एक चक्र के बाद हर तीन वर्ष के बाद देश में निर्धारित किसी भी
स्थान पर होता है और इस प्रकार देश के चार धामों,बारह ज्योतिर्लिंगों और इक्यावन शक्ति-
पीठों के रूप में एकता के कारक, उत्प्रेरक या केन्द्र जो भी कहा जाय का पर्याय बन कर देश
को,भारतीय संस्कृति को एक बनाए रखता है | यहां पर हम प्रत्यक्ष पाते हैं,भारतीय मनीषियों
और नीति नियन्ताओं की महान और दीर्घगामी सोच की प्रबल पारिणति के रूप में भारत की
एकात्मता का एक सूत्र |
                    कुम्भ वास्तव में निर्धारित तिथि,निर्धारित नदी, निर्धारित स्थान और निर्धा-
रित अवधि में होने वाले स्नान का नाम है | जिसे करना एक हिन्दू का अनिवार्य कर्म है |
इसकी अनिवार्यता और इस बहाने देश के विभिन्न अंगों के वासियों का विराट सम्मेलन ही
देश की संस्कृति की एकात्मता और अखण्डता का माध्यम बनता है |
                   कुंभ की मूल कथा समुद्रमंथन के समय प्राप्त अमृत-कुंभ(घट या घड़ा)  से
सम्बद्ध है | आख्यान है कि देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र-मंथन के सामुहिक अनुष्ठान से
समुद्र से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए उनमें एक अमृत-घट भी था | अमृत-घट को राक्षसों ने -
हस्तगत कर लिया | उनसे युक्तियुक्त तरीके से देवताओं ने घट प्राप्त कर पृथ्वी पर जिन -
चार स्थानों पर रखा वे स्थान थे- हरिद्वार(उत्तराखण्ड),प्रयाग(उत्तर प्रदेश),उज्जैन(मध्यप्रदेश्)
और नासिक(महाराष्ट्र)|  माना जाता है कि इन स्थानों पर अमृत-घट रखने से उसमें से कुछ
बूंदें छलक कर गिरीं और ये स्थान अमृतमय हो गए | यह भी एक सत्य है कि इन तिथियों
का खगोलीय ऋतु परिवर्तन और ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति भी इन स्थानों पर कुम्भ के -
रूप में सम्पूर्ण भारतीय समाज के सम्मिलन की विशिष्टता बनती है | स्कन्धपुराण के अनुसार
भी कुंभ पर्व ज्योतिष गणित पर आधारित पर्व है |जब सूर्य मेष राशि पर आए और वृहस्पति
कुंभ राशि पर हो तो हरिद्वार में गंगा मे स्नान का कुंभयोग बनता है | प्रयाग में गंगा-यमुना
के संगम पर सूर्य मकर राशि पर और वृहस्पति बृष राशि पर हो इस संयोग का माघ माह में
पड़ना आवश्यक होता है | इसी प्रकार निर्धारित तिथि को निर्धारित ग्रह-स्थिति में नासिक में
नर्मदा पर कुम्भ होता है किन्तु क्षिप्रा तट पर उज्जैन में होने वाले कुंभ में बड़ी जटिल स्थिति
है, इसके लिए दस योग का होना आवश्यक है-वैशाख मास,शुकल पक्ष,पूर्णिमा,मेष राशि का
सूर्य,सिंह राशि पर वृहस्पति,तुला राशि पर चन्द्रमा,स्वाति नक्षत्र,व्यतिपात योग और उज्जयिनी
का क्षिप्रातट | इन में से एक भी कम होने पर यह तब होता है जब सिंह् राशि पर सूर्य और
वृहस्पति,पूर्णिमा तिथि और गुरूवार हो |
                कुंभ लगभग तीन माह के विराट सांस्कृतिक व धार्मिक सम्मिलन की विराट
प्रक्रिया का नाम है | प्रारम्भिक,मुख्य और अंतिम स्नान के मध्य लगभग तीन माह का
समय निर्धारित होता है जिसमें भारतीय उपखण्ड के अतिरिक्त विदेशों से आए हुए श्रद्धालु -
और पर्यटक महीनों नदी तट पर आवास कर धार्मिक कृत्य करते हैं | नदी तट पर कई-
कई किलोमीटर लम्बे चौड़े झोपड़ियों के नगर बस जाते हैं | बड़े-बड़े आलीशान शामियाने
व लग्जरी तम्बू खड़े हो जाते हैं | अस्थाई सड़कें,पुल और अन्य नागरिक सुविधाओं  की
अस्थाई व्यवस्थायें शासन कर देता है तथा शांति व्यवस्था तथा जनस्वास्थ्य के लिए तो
अति विशिष्ट सुविधाओं का प्रवन्ध हो जाता है |
               इस वर्ष प्रयाग में होने वाले कुंभ का मुख्य स्नान चौदह जनवरी मकर संक्राति
को हो रहा है तथा अंतिम स्नान दस मार्च महाशिवरात्रि को निश्चित है | इन स्नानों को -
शाही स्नान कहा जाता है | इस बार दूसरा स्नान सत्ताईस जनवरी पौष पूर्णिमा,तीसरा स्नान
दस फरवरी मौनी अमावस्या तथा चौथा स्नान पन्द्रह फरवरी बसन्त पंचमी को पड़ रहा है |
               कुंभ के पवित्र योग पर सर्वप्रथम स्नान का अधिकार विशिष्ट नागा अखाड़ों को ही
प्राप्त है | इनके स्नान के उपरान्त ही जनसाधारण को स्नान का अधिकार मिलता है | भारत
में संन्यासियों के अखाड़ों की परम्परा जनश्रुतियों और इतिहास अथवा पुराणों में उल्लिखित-
आख्यानों के अनुसार काफी पुरानी है | प्राचीन काल में और अंग्रेजों के समय भी उनके अधीन
राजामहाराजाओं के शासन काल में इन नागाअखाड़ों की अपनी लगभग स्वतंत्र सत्ता होती थी |
बल्कि कहीं-कहीं पर तो इनका स्थानीय शासकों पर सम्पूर्ण अधिकार तक होता था | ऐसे
भी उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं जब इन अखाडों ने जो चाहा वही हुआ | आज भी अखाड़े के
अन्दर इनका अपना शासन ही चलता है |जनश्रुतियो और ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इन
अखाड़ों का इतिहास इस प्रकार प्राप्त होता है-
         नागाअखाड़ों की परम्परा में सबसे प्राचीन 'आवाहन' अखाड़े का इतिहास प्राप्त होता
है | इसकी स्थापना सन 547 में हुई थी | इसकी स्थापना के लगभग एक सौ वर्ष बाद-
सन 647 में अटल अखाड़े का गोंडवाना में जन्म हुआ किन्तु इसका मुख्यालय वाराणसी में
है | सन 855 में आनंद अखाड़ा अस्तित्व में आया तो गुजरात के कच्छ में निरंजनी अखाड़ा
सन 904 में जन्मा | जूना अखाड़ा जिसे भैरवी अखाड़ा भी कहते हैं की स्थापना सन 1060
में उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई | इस अखाड़े की विशेषता यह है कि इस की सदस्य -
महिलाएं भी हो सकती हैं | ये नागा महिलाएं अवधूतनी कहलाती हैं | इसकी शाखाएं हरि-
द्वार, प्रयाग, उज्जैन और त्रयंबक में हैं |  इस अखाड़े में भैरव की पूजा इष्ट है | निरंजनी -
अखाड़े का मुख्यालय हरिद्वार में है | शैव सन्यासियों के अखाड़े निर्वाणी का जन्म तो झार-
खण्ड के कुण्डागढ के सिद्धेश्वर मन्दिर में हुआ किन्तु इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के हरिद्वार
में है | यह अखाड़ा अपने सिद्धमहंतों के लिए प्रसिद्ध है और इसने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिए
शिव की नगरी वाराणसी की सुरक्षा हेतु सन 1664 में औरंगजेब से दो बार युद्ध किया था |
वर्तमान में देश में दशनामी सन्यासियों के भी कई अखाड़े विद्यमान हैं |  
           वस्तुतः नागा अखाड़े हिन्दू धर्म को समर्पित हिन्दुओं के सर्वत्यागी(वस्त्र तक) युवा
सन्यासियों की छावनियां थी जो हिन्दूधर्म पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के
लिए मतावलम्बियों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किए गये थे | कालान्तर में इनके
कई-कई बार (मत वैभिन्नता के कारण) आपस में भी लड़ने का इतिहास रहा है | अकबर के
काल में तो दो अखाड़ों के अकबर द्वारा कराए गए युद्ध का बड़ा सजीव वर्णन 'आईने अक-
बरी' मे मिलता है | अखाड़ों की परम्परा में पिछली शताब्दी में वैष्णव, अग्नि, उदासीन,-
बड़ा उदासीन और निर्मल पंचायत अखाड़ों की स्थापना हुई | अखाड़ों का सदस्य शारिरिक-रूप से
स्वस्थ वही व्यक्ति हो सकता है जो संसार की मोहमाया त्याग कर सन्यास ग्रहण कर चुका हो
और अखाड़ों की परम्पराओं का जान देकर पालन करने के परीक्षणों पर खरा उतरा हो, धर्म के
लिए मर मिटने को तैयार हो |
           कुंभ में उमड़े अपार जन समूह और विभिन्न मत-मतान्तरों की विभिन्न
उप संस्कृतियों को एक स्थान पर एक दूसरे से समन्वय स्थापित करते देखना भी एक -
अलग ही अनुभव है | हिन्दू धर्म में विभिन्न तरीकों से अपनी आस्था के प्रति समर्पित-
मानव जन-समूह निर्जन नदी तट को एक सार्थक धार्मिक महा नगर का स्वरूप प्रदान कर
देता है | जिधर देखो लाखों झोपड़ी,टिन शेड,प्लाईवुड से बने मनमोहक ढांचे और शामियाने-
तम्बू तथा उनमें उमड़ा अपार जनसमूह यह सोचने को विवश कर देता है कि भारत में ही
है कहीं भगवान का निवास | हर अखाड़ा अपने वैभव का खुला प्रदर्शन करता प्रतीत होता
है | हर आगन्तुक भगवान अथवा अपने इष्ट का नाम जपता एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत होता
है, लगता है कि उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के सारे भेद मिट गए हैं |  सारा भारत एक हो-
गया है | विभिन्न मत-मतान्तर और उप-संस्कृतियां एकात्म हो गई हैं | बाकी बची कुछ
दूरियां भी शनैः-शनैः मिट जाएंगी कुंभ की इस अविरल महायात्रा के बारह और छैः वर्षों के
निश्चत अन्तराल में जो, इन चारों स्थानों पर क्रमशः आता है और प्रत्येक किसी स्थान पर
तीन वर्ष के अन्तराल में कुंभ या अर्ध-कुम्भ के रूप में आकर सम्पूर्ण भारत और विदेश में
बसे भारतीयों के मनों और सांस्कृतिक एकात्मता को दस्तक देकर जगा जाता है | विधर्मियों
और विदेशियों को आश्चर्यचकित करने के लिए कि आखिर वह कौन सा तत्व है जो इतने बड़े-
उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधे रखता है ? हिलने भी नहीं देता ?|
सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888      

संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ


संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ
                                                          - डा.राज सक्सेना
           अधिकतर विदेशी और कुछ देशवासी भी इसे विडम्बना मानते हैं कि भारतीय
संस्कृति में इतनी विभिन्नताओं के बावजूद इतनी एकात्मता कैसे है?| विभिन्न मतभिन्नता
पूरे देश को एक सूत्र में कैसे बांध देती है | प्राकृतिक,वैचारिक और धार्मिक विश्वासों की वि-
भिन्नताओं के रहते सब लोग एकता के गठबन्धन में कैसे बंधे रहते हैं?|
                  भारत के ऋषि-महर्षियों और मनीषियों ने भरतभूमि के इतने बड़े खण्ड जिसे
उपमहाद्वीप की संज्ञा स्वतः प्राप्त हो चुकी है को एक सूत्र में बांधने और विभिन्न राजनैतिक
इकाइयों में बंटे होने के बावजूद देश की सांस्कृतिक एकता अक्षणु रखने के लिए हिन्दू मता-
वलम्बियों के पारस्परिक सम्मिलन से उन्हें एक बनाए रखने की परिकल्पना को धार्मिक आ-
वरण में अनिवार्यता प्रदत्त करके अपनी श्रेष्ट सामाजिक सोच का प्रमाण दिया है | एकसूत्रता
के उद्देश्य से इस प्रकार की परिकल्पना जो देश के विभिन्न चार  स्थानों पर बारह वर्ष के-
अन्तराल पर सांस्कृतिक समागम के लिये की गई हो अन्यत्र किसी धर्म या वर्ग में उपलब्ध
नहीं है | इतना ही नहीं लम्बे अन्तराल को कुछ कम करने के सद्प्रयास के रूप में इसे -
अर्द्ध-कुम्भ का स्वरूप प्रदान कर दिया गया | जिससे यह अनिवार्य रूप से चारों स्थानों में
छै;वर्ष के उपरान्त किन्तु एक चक्र के बाद हर तीन वर्ष के बाद देश में निर्धारित किसी भी
स्थान पर होता है और इस प्रकार देश के चार धामों,बारह ज्योतिर्लिंगों और इक्यावन शक्ति-
पीठों के रूप में एकता के कारक, उत्प्रेरक या केन्द्र जो भी कहा जाय का पर्याय बन कर देश
को,भारतीय संस्कृति को एक बनाए रखता है | यहां पर हम प्रत्यक्ष पाते हैं,भारतीय मनीषियों
और नीति नियन्ताओं की महान और दीर्घगामी सोच की प्रबल पारिणति के रूप में भारत की
एकात्मता का एक सूत्र |
                    कुम्भ वास्तव में निर्धारित तिथि,निर्धारित नदी, निर्धारित स्थान और निर्धा-
रित अवधि में होने वाले स्नान का नाम है | जिसे करना एक हिन्दू का अनिवार्य कर्म है |
इसकी अनिवार्यता और इस बहाने देश के विभिन्न अंगों के वासियों का विराट सम्मेलन ही
देश की संस्कृति की एकात्मता और अखण्डता का माध्यम बनता है |
                   कुंभ की मूल कथा समुद्रमंथन के समय प्राप्त अमृत-कुंभ(घट या घड़ा)  से
सम्बद्ध है | आख्यान है कि देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र-मंथन के सामुहिक अनुष्ठान से
समुद्र से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए उनमें एक अमृत-घट भी था | अमृत-घट को राक्षसों ने -
हस्तगत कर लिया | उनसे युक्तियुक्त तरीके से देवताओं ने घट प्राप्त कर पृथ्वी पर जिन -
चार स्थानों पर रखा वे स्थान थे- हरिद्वार(उत्तराखण्ड),प्रयाग(उत्तर प्रदेश),उज्जैन(मध्यप्रदेश्)
और नासिक(महाराष्ट्र)|  माना जाता है कि इन स्थानों पर अमृत-घट रखने से उसमें से कुछ
बूंदें छलक कर गिरीं और ये स्थान अमृतमय हो गए | यह भी एक सत्य है कि इन तिथियों
का खगोलीय ऋतु परिवर्तन और ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति भी इन स्थानों पर कुम्भ के -
रूप में सम्पूर्ण भारतीय समाज के सम्मिलन की विशिष्टता बनती है | स्कन्धपुराण के अनुसार
भी कुंभ पर्व ज्योतिष गणित पर आधारित पर्व है |जब सूर्य मेष राशि पर आए और वृहस्पति
कुंभ राशि पर हो तो हरिद्वार में गंगा मे स्नान का कुंभयोग बनता है | प्रयाग में गंगा-यमुना
के संगम पर सूर्य मकर राशि पर और वृहस्पति बृष राशि पर हो इस संयोग का माघ माह में
पड़ना आवश्यक होता है | इसी प्रकार निर्धारित तिथि को निर्धारित ग्रह-स्थिति में नासिक में
नर्मदा पर कुम्भ होता है किन्तु क्षिप्रा तट पर उज्जैन में होने वाले कुंभ में बड़ी जटिल स्थिति
है, इसके लिए दस योग का होना आवश्यक है-वैशाख मास,शुकल पक्ष,पूर्णिमा,मेष राशि का
सूर्य,सिंह राशि पर वृहस्पति,तुला राशि पर चन्द्रमा,स्वाति नक्षत्र,व्यतिपात योग और उज्जयिनी
का क्षिप्रातट | इन में से एक भी कम होने पर यह तब होता है जब सिंह् राशि पर सूर्य और
वृहस्पति,पूर्णिमा तिथि और गुरूवार हो |
                कुंभ लगभग तीन माह के विराट सांस्कृतिक व धार्मिक सम्मिलन की विराट
प्रक्रिया का नाम है | प्रारम्भिक,मुख्य और अंतिम स्नान के मध्य लगभग तीन माह का
समय निर्धारित होता है जिसमें भारतीय उपखण्ड के अतिरिक्त विदेशों से आए हुए श्रद्धालु -
और पर्यटक महीनों नदी तट पर आवास कर धार्मिक कृत्य करते हैं | नदी तट पर कई-
कई किलोमीटर लम्बे चौड़े झोपड़ियों के नगर बस जाते हैं | बड़े-बड़े आलीशान शामियाने
व लग्जरी तम्बू खड़े हो जाते हैं | अस्थाई सड़कें,पुल और अन्य नागरिक सुविधाओं  की
अस्थाई व्यवस्थायें शासन कर देता है तथा शांति व्यवस्था तथा जनस्वास्थ्य के लिए तो
अति विशिष्ट सुविधाओं का प्रवन्ध हो जाता है |
               इस वर्ष प्रयाग में होने वाले कुंभ का मुख्य स्नान चौदह जनवरी मकर संक्राति
को हो रहा है तथा अंतिम स्नान दस मार्च महाशिवरात्रि को निश्चित है | इन स्नानों को -
शाही स्नान कहा जाता है | इस बार दूसरा स्नान सत्ताईस जनवरी पौष पूर्णिमा,तीसरा स्नान
दस फरवरी मौनी अमावस्या तथा चौथा स्नान पन्द्रह फरवरी बसन्त पंचमी को पड़ रहा है |
               कुंभ के पवित्र योग पर सर्वप्रथम स्नान का अधिकार विशिष्ट नागा अखाड़ों को ही
प्राप्त है | इनके स्नान के उपरान्त ही जनसाधारण को स्नान का अधिकार मिलता है | भारत
में संन्यासियों के अखाड़ों की परम्परा जनश्रुतियों और इतिहास अथवा पुराणों में उल्लिखित-
आख्यानों के अनुसार काफी पुरानी है | प्राचीन काल में और अंग्रेजों के समय भी उनके अधीन
राजामहाराजाओं के शासन काल में इन नागाअखाड़ों की अपनी लगभग स्वतंत्र सत्ता होती थी |
बल्कि कहीं-कहीं पर तो इनका स्थानीय शासकों पर सम्पूर्ण अधिकार तक होता था | ऐसे
भी उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं जब इन अखाडों ने जो चाहा वही हुआ | आज भी अखाड़े के
अन्दर इनका अपना शासन ही चलता है |जनश्रुतियो और ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इन
अखाड़ों का इतिहास इस प्रकार प्राप्त होता है-
         नागाअखाड़ों की परम्परा में सबसे प्राचीन 'आवाहन' अखाड़े का इतिहास प्राप्त होता
है | इसकी स्थापना सन 547 में हुई थी | इसकी स्थापना के लगभग एक सौ वर्ष बाद-
सन 647 में अटल अखाड़े का गोंडवाना में जन्म हुआ किन्तु इसका मुख्यालय वाराणसी में
है | सन 855 में आनंद अखाड़ा अस्तित्व में आया तो गुजरात के कच्छ में निरंजनी अखाड़ा
सन 904 में जन्मा | जूना अखाड़ा जिसे भैरवी अखाड़ा भी कहते हैं की स्थापना सन 1060
में उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई | इस अखाड़े की विशेषता यह है कि इस की सदस्य -
महिलाएं भी हो सकती हैं | ये नागा महिलाएं अवधूतनी कहलाती हैं | इसकी शाखाएं हरि-
द्वार, प्रयाग, उज्जैन और त्रयंबक में हैं |  इस अखाड़े में भैरव की पूजा इष्ट है | निरंजनी -
अखाड़े का मुख्यालय हरिद्वार में है | शैव सन्यासियों के अखाड़े निर्वाणी का जन्म तो झार-
खण्ड के कुण्डागढ के सिद्धेश्वर मन्दिर में हुआ किन्तु इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के हरिद्वार
में है | यह अखाड़ा अपने सिद्धमहंतों के लिए प्रसिद्ध है और इसने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिए
शिव की नगरी वाराणसी की सुरक्षा हेतु सन 1664 में औरंगजेब से दो बार युद्ध किया था |
वर्तमान में देश में दशनामी सन्यासियों के भी कई अखाड़े विद्यमान हैं |  
           वस्तुतः नागा अखाड़े हिन्दू धर्म को समर्पित हिन्दुओं के सर्वत्यागी(वस्त्र तक) युवा
सन्यासियों की छावनियां थी जो हिन्दूधर्म पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के
लिए मतावलम्बियों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किए गये थे | कालान्तर में इनके
कई-कई बार (मत वैभिन्नता के कारण) आपस में भी लड़ने का इतिहास रहा है | अकबर के
काल में तो दो अखाड़ों के अकबर द्वारा कराए गए युद्ध का बड़ा सजीव वर्णन 'आईने अक-
बरी' मे मिलता है | अखाड़ों की परम्परा में पिछली शताब्दी में वैष्णव, अग्नि, उदासीन,-
बड़ा उदासीन और निर्मल पंचायत अखाड़ों की स्थापना हुई | अखाड़ों का सदस्य शारिरिक-रूप से
स्वस्थ वही व्यक्ति हो सकता है जो संसार की मोहमाया त्याग कर सन्यास ग्रहण कर चुका हो
और अखाड़ों की परम्पराओं का जान देकर पालन करने के परीक्षणों पर खरा उतरा हो, धर्म के
लिए मर मिटने को तैयार हो |
           कुंभ में उमड़े अपार जन समूह और विभिन्न मत-मतान्तरों की विभिन्न
उप संस्कृतियों को एक स्थान पर एक दूसरे से समन्वय स्थापित करते देखना भी एक -
अलग ही अनुभव है | हिन्दू धर्म में विभिन्न तरीकों से अपनी आस्था के प्रति समर्पित-
मानव जन-समूह निर्जन नदी तट को एक सार्थक धार्मिक महा नगर का स्वरूप प्रदान कर
देता है | जिधर देखो लाखों झोपड़ी,टिन शेड,प्लाईवुड से बने मनमोहक ढांचे और शामियाने-
तम्बू तथा उनमें उमड़ा अपार जनसमूह यह सोचने को विवश कर देता है कि भारत में ही
है कहीं भगवान का निवास | हर अखाड़ा अपने वैभव का खुला प्रदर्शन करता प्रतीत होता
है | हर आगन्तुक भगवान अथवा अपने इष्ट का नाम जपता एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत होता
है, लगता है कि उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के सारे भेद मिट गए हैं |  सारा भारत एक हो-
गया है | विभिन्न मत-मतान्तर और उप-संस्कृतियां एकात्म हो गई हैं | बाकी बची कुछ
दूरियां भी शनैः-शनैः मिट जाएंगी कुंभ की इस अविरल महायात्रा के बारह और छैः वर्षों के
निश्चत अन्तराल में जो, इन चारों स्थानों पर क्रमशः आता है और प्रत्येक किसी स्थान पर
तीन वर्ष के अन्तराल में कुंभ या अर्ध-कुम्भ के रूप में आकर सम्पूर्ण भारत और विदेश में
बसे भारतीयों के मनों और सांस्कृतिक एकात्मता को दस्तक देकर जगा जाता है | विधर्मियों
और विदेशियों को आश्चर्यचकित करने के लिए कि आखिर वह कौन सा तत्व है जो इतने बड़े-
उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधे रखता है ? हिलने भी नहीं देता ?|
सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888      

संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ


संस्कृति की एकता के सूत्र हैं कुंभ
                                                          - डा.राज सक्सेना
           अधिकतर विदेशी और कुछ देशवासी भी इसे विडम्बना मानते हैं कि भारतीय
संस्कृति में इतनी विभिन्नताओं के बावजूद इतनी एकात्मता कैसे है?| विभिन्न मतभिन्नता
पूरे देश को एक सूत्र में कैसे बांध देती है | प्राकृतिक,वैचारिक और धार्मिक विश्वासों की वि-
भिन्नताओं के रहते सब लोग एकता के गठबन्धन में कैसे बंधे रहते हैं?|
                  भारत के ऋषि-महर्षियों और मनीषियों ने भरतभूमि के इतने बड़े खण्ड जिसे
उपमहाद्वीप की संज्ञा स्वतः प्राप्त हो चुकी है को एक सूत्र में बांधने और विभिन्न राजनैतिक
इकाइयों में बंटे होने के बावजूद देश की सांस्कृतिक एकता अक्षणु रखने के लिए हिन्दू मता-
वलम्बियों के पारस्परिक सम्मिलन से उन्हें एक बनाए रखने की परिकल्पना को धार्मिक आ-
वरण में अनिवार्यता प्रदत्त करके अपनी श्रेष्ट सामाजिक सोच का प्रमाण दिया है | एकसूत्रता
के उद्देश्य से इस प्रकार की परिकल्पना जो देश के विभिन्न चार  स्थानों पर बारह वर्ष के-
अन्तराल पर सांस्कृतिक समागम के लिये की गई हो अन्यत्र किसी धर्म या वर्ग में उपलब्ध
नहीं है | इतना ही नहीं लम्बे अन्तराल को कुछ कम करने के सद्प्रयास के रूप में इसे -
अर्द्ध-कुम्भ का स्वरूप प्रदान कर दिया गया | जिससे यह अनिवार्य रूप से चारों स्थानों में
छै;वर्ष के उपरान्त किन्तु एक चक्र के बाद हर तीन वर्ष के बाद देश में निर्धारित किसी भी
स्थान पर होता है और इस प्रकार देश के चार धामों,बारह ज्योतिर्लिंगों और इक्यावन शक्ति-
पीठों के रूप में एकता के कारक, उत्प्रेरक या केन्द्र जो भी कहा जाय का पर्याय बन कर देश
को,भारतीय संस्कृति को एक बनाए रखता है | यहां पर हम प्रत्यक्ष पाते हैं,भारतीय मनीषियों
और नीति नियन्ताओं की महान और दीर्घगामी सोच की प्रबल पारिणति के रूप में भारत की
एकात्मता का एक सूत्र |
                    कुम्भ वास्तव में निर्धारित तिथि,निर्धारित नदी, निर्धारित स्थान और निर्धा-
रित अवधि में होने वाले स्नान का नाम है | जिसे करना एक हिन्दू का अनिवार्य कर्म है |
इसकी अनिवार्यता और इस बहाने देश के विभिन्न अंगों के वासियों का विराट सम्मेलन ही
देश की संस्कृति की एकात्मता और अखण्डता का माध्यम बनता है |
                   कुंभ की मूल कथा समुद्रमंथन के समय प्राप्त अमृत-कुंभ(घट या घड़ा)  से
सम्बद्ध है | आख्यान है कि देवताओं और राक्षसों द्वारा समुद्र-मंथन के सामुहिक अनुष्ठान से
समुद्र से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए उनमें एक अमृत-घट भी था | अमृत-घट को राक्षसों ने -
हस्तगत कर लिया | उनसे युक्तियुक्त तरीके से देवताओं ने घट प्राप्त कर पृथ्वी पर जिन -
चार स्थानों पर रखा वे स्थान थे- हरिद्वार(उत्तराखण्ड),प्रयाग(उत्तर प्रदेश),उज्जैन(मध्यप्रदेश्)
और नासिक(महाराष्ट्र)|  माना जाता है कि इन स्थानों पर अमृत-घट रखने से उसमें से कुछ
बूंदें छलक कर गिरीं और ये स्थान अमृतमय हो गए | यह भी एक सत्य है कि इन तिथियों
का खगोलीय ऋतु परिवर्तन और ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति भी इन स्थानों पर कुम्भ के -
रूप में सम्पूर्ण भारतीय समाज के सम्मिलन की विशिष्टता बनती है | स्कन्धपुराण के अनुसार
भी कुंभ पर्व ज्योतिष गणित पर आधारित पर्व है |जब सूर्य मेष राशि पर आए और वृहस्पति
कुंभ राशि पर हो तो हरिद्वार में गंगा मे स्नान का कुंभयोग बनता है | प्रयाग में गंगा-यमुना
के संगम पर सूर्य मकर राशि पर और वृहस्पति बृष राशि पर हो इस संयोग का माघ माह में
पड़ना आवश्यक होता है | इसी प्रकार निर्धारित तिथि को निर्धारित ग्रह-स्थिति में नासिक में
नर्मदा पर कुम्भ होता है किन्तु क्षिप्रा तट पर उज्जैन में होने वाले कुंभ में बड़ी जटिल स्थिति
है, इसके लिए दस योग का होना आवश्यक है-वैशाख मास,शुकल पक्ष,पूर्णिमा,मेष राशि का
सूर्य,सिंह राशि पर वृहस्पति,तुला राशि पर चन्द्रमा,स्वाति नक्षत्र,व्यतिपात योग और उज्जयिनी
का क्षिप्रातट | इन में से एक भी कम होने पर यह तब होता है जब सिंह् राशि पर सूर्य और
वृहस्पति,पूर्णिमा तिथि और गुरूवार हो |
                कुंभ लगभग तीन माह के विराट सांस्कृतिक व धार्मिक सम्मिलन की विराट
प्रक्रिया का नाम है | प्रारम्भिक,मुख्य और अंतिम स्नान के मध्य लगभग तीन माह का
समय निर्धारित होता है जिसमें भारतीय उपखण्ड के अतिरिक्त विदेशों से आए हुए श्रद्धालु -
और पर्यटक महीनों नदी तट पर आवास कर धार्मिक कृत्य करते हैं | नदी तट पर कई-
कई किलोमीटर लम्बे चौड़े झोपड़ियों के नगर बस जाते हैं | बड़े-बड़े आलीशान शामियाने
व लग्जरी तम्बू खड़े हो जाते हैं | अस्थाई सड़कें,पुल और अन्य नागरिक सुविधाओं  की
अस्थाई व्यवस्थायें शासन कर देता है तथा शांति व्यवस्था तथा जनस्वास्थ्य के लिए तो
अति विशिष्ट सुविधाओं का प्रवन्ध हो जाता है |
               इस वर्ष प्रयाग में होने वाले कुंभ का मुख्य स्नान चौदह जनवरी मकर संक्राति
को हो रहा है तथा अंतिम स्नान दस मार्च महाशिवरात्रि को निश्चित है | इन स्नानों को -
शाही स्नान कहा जाता है | इस बार दूसरा स्नान सत्ताईस जनवरी पौष पूर्णिमा,तीसरा स्नान
दस फरवरी मौनी अमावस्या तथा चौथा स्नान पन्द्रह फरवरी बसन्त पंचमी को पड़ रहा है |
               कुंभ के पवित्र योग पर सर्वप्रथम स्नान का अधिकार विशिष्ट नागा अखाड़ों को ही
प्राप्त है | इनके स्नान के उपरान्त ही जनसाधारण को स्नान का अधिकार मिलता है | भारत
में संन्यासियों के अखाड़ों की परम्परा जनश्रुतियों और इतिहास अथवा पुराणों में उल्लिखित-
आख्यानों के अनुसार काफी पुरानी है | प्राचीन काल में और अंग्रेजों के समय भी उनके अधीन
राजामहाराजाओं के शासन काल में इन नागाअखाड़ों की अपनी लगभग स्वतंत्र सत्ता होती थी |
बल्कि कहीं-कहीं पर तो इनका स्थानीय शासकों पर सम्पूर्ण अधिकार तक होता था | ऐसे
भी उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं जब इन अखाडों ने जो चाहा वही हुआ | आज भी अखाड़े के
अन्दर इनका अपना शासन ही चलता है |जनश्रुतियो और ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इन
अखाड़ों का इतिहास इस प्रकार प्राप्त होता है-
         नागाअखाड़ों की परम्परा में सबसे प्राचीन 'आवाहन' अखाड़े का इतिहास प्राप्त होता
है | इसकी स्थापना सन 547 में हुई थी | इसकी स्थापना के लगभग एक सौ वर्ष बाद-
सन 647 में अटल अखाड़े का गोंडवाना में जन्म हुआ किन्तु इसका मुख्यालय वाराणसी में
है | सन 855 में आनंद अखाड़ा अस्तित्व में आया तो गुजरात के कच्छ में निरंजनी अखाड़ा
सन 904 में जन्मा | जूना अखाड़ा जिसे भैरवी अखाड़ा भी कहते हैं की स्थापना सन 1060
में उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई | इस अखाड़े की विशेषता यह है कि इस की सदस्य -
महिलाएं भी हो सकती हैं | ये नागा महिलाएं अवधूतनी कहलाती हैं | इसकी शाखाएं हरि-
द्वार, प्रयाग, उज्जैन और त्रयंबक में हैं |  इस अखाड़े में भैरव की पूजा इष्ट है | निरंजनी -
अखाड़े का मुख्यालय हरिद्वार में है | शैव सन्यासियों के अखाड़े निर्वाणी का जन्म तो झार-
खण्ड के कुण्डागढ के सिद्धेश्वर मन्दिर में हुआ किन्तु इसका मुख्यालय उत्तराखण्ड के हरिद्वार
में है | यह अखाड़ा अपने सिद्धमहंतों के लिए प्रसिद्ध है और इसने हिन्दूधर्म की रक्षा के लिए
शिव की नगरी वाराणसी की सुरक्षा हेतु सन 1664 में औरंगजेब से दो बार युद्ध किया था |
वर्तमान में देश में दशनामी सन्यासियों के भी कई अखाड़े विद्यमान हैं |  
           वस्तुतः नागा अखाड़े हिन्दू धर्म को समर्पित हिन्दुओं के सर्वत्यागी(वस्त्र तक) युवा
सन्यासियों की छावनियां थी जो हिन्दूधर्म पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों के प्रतिकार के
लिए मतावलम्बियों द्वारा आवश्यकता के अनुरूप गठित किए गये थे | कालान्तर में इनके
कई-कई बार (मत वैभिन्नता के कारण) आपस में भी लड़ने का इतिहास रहा है | अकबर के
काल में तो दो अखाड़ों के अकबर द्वारा कराए गए युद्ध का बड़ा सजीव वर्णन 'आईने अक-
बरी' मे मिलता है | अखाड़ों की परम्परा में पिछली शताब्दी में वैष्णव, अग्नि, उदासीन,-
बड़ा उदासीन और निर्मल पंचायत अखाड़ों की स्थापना हुई | अखाड़ों का सदस्य शारिरिक-रूप से
स्वस्थ वही व्यक्ति हो सकता है जो संसार की मोहमाया त्याग कर सन्यास ग्रहण कर चुका हो
और अखाड़ों की परम्पराओं का जान देकर पालन करने के परीक्षणों पर खरा उतरा हो, धर्म के
लिए मर मिटने को तैयार हो |
           कुंभ में उमड़े अपार जन समूह और विभिन्न मत-मतान्तरों की विभिन्न
उप संस्कृतियों को एक स्थान पर एक दूसरे से समन्वय स्थापित करते देखना भी एक -
अलग ही अनुभव है | हिन्दू धर्म में विभिन्न तरीकों से अपनी आस्था के प्रति समर्पित-
मानव जन-समूह निर्जन नदी तट को एक सार्थक धार्मिक महा नगर का स्वरूप प्रदान कर
देता है | जिधर देखो लाखों झोपड़ी,टिन शेड,प्लाईवुड से बने मनमोहक ढांचे और शामियाने-
तम्बू तथा उनमें उमड़ा अपार जनसमूह यह सोचने को विवश कर देता है कि भारत में ही
है कहीं भगवान का निवास | हर अखाड़ा अपने वैभव का खुला प्रदर्शन करता प्रतीत होता
है | हर आगन्तुक भगवान अथवा अपने इष्ट का नाम जपता एक दूसरे से जुड़ा प्रतीत होता
है, लगता है कि उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के सारे भेद मिट गए हैं |  सारा भारत एक हो-
गया है | विभिन्न मत-मतान्तर और उप-संस्कृतियां एकात्म हो गई हैं | बाकी बची कुछ
दूरियां भी शनैः-शनैः मिट जाएंगी कुंभ की इस अविरल महायात्रा के बारह और छैः वर्षों के
निश्चत अन्तराल में जो, इन चारों स्थानों पर क्रमशः आता है और प्रत्येक किसी स्थान पर
तीन वर्ष के अन्तराल में कुंभ या अर्ध-कुम्भ के रूप में आकर सम्पूर्ण भारत और विदेश में
बसे भारतीयों के मनों और सांस्कृतिक एकात्मता को दस्तक देकर जगा जाता है | विधर्मियों
और विदेशियों को आश्चर्यचकित करने के लिए कि आखिर वह कौन सा तत्व है जो इतने बड़े-
उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बांधे रखता है ? हिलने भी नहीं देता ?|
सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888      

शनिवार, 5 जनवरी 2013


     baal kahaaniyaan                    
                                इसमें भी कुछ भला है
                       -डा.राज सक्सेना
         बहुत समय पहले की बात है उत्तर भारत के सैकड़ों किलोमीटर लम्बे मैदान के
मध्य कोसी नदी के किनारे एक रोहिला रियासत थी जिसकी राजधानी रामपुर थी और यह
नवाबी, रियासत रामपुर के नाम से जानी जाती थी |
              रामपुर नगर से लगभग तेरह किलोमीटर दूर खेमपुर नाम का एक बड़ा गांव
था जिसमें बुद्धसेन नामक बुद्धिमान व्यक्ति रहता था | वह अच्छी खासी खेती का मालिक
था | एक सुगढ पत्नी, एक बेटा, एक बेटी और एक शानदार घोड़ा जिसे उसने बचपन से
बड़े प्यार से पाला था, उसके परिवारजन थे | बुद्धसेन बहुत बुद्धिमान,नेक और दूसरों की
मदद करने वाला एक सकारात्मक सोच का व्यक्ति था | कुछ भी हो जाय वह कभी बुरा -
सोचता तक नहीं था | उसकी सोच यह रहती थी कि जो हो रहा है अच्छे के लिए हो रहा
है | जो भी होगा वह अच्छा ही होगा |
                       बुद्धसेन अपने घोड़े को अपने बेटे के समान प्यार करता था | एक बार -
ऐसा हुआ कि उसका घोड़ा गायब हो गया | बुद्धसेन दुखी तो हुआ लेकिन निराश नहीं हुआ,
लोगों ने कहा," बड़ा बुरा हुआ तुम्हारा घोड़ा चोरी हो गया |"
                     बुद्धसेन ने कहा,"कुछ भी बुरा नहीं हुआ | उसके चोरी जाने में भी मेरी -
और उस (घोड़े)की कुछ भलाई है जो कुछ दिनों में सामने आ जाएगी |" लोग चुप हो -
गए | समय बीतता रहा | एक साल बीत गया |
                  और एक दिन लोगों ने देखा कि बुद्धसेन का घोड़ा अपने खूंटे के पास एक
नए शानदार घोड़े के साथ खड़ा था | लोगों ने बुद्धसेन की सोच और सहनशक्ति की प्रशंसा
की | किन्तु बुद्धसेन खुश नहीं हुआ | उसने आसमान की ओर निहार कर, एक ठंडी सांस
लेकर कहा, "जैसी तेरी मर्जी |"
                    लोगों को ताज्जुब हुआ मगर क्या कह सकते थे |
                     समय बीतता रहा | बुद्धसेन और उसका पुत्र नए घोडे को प्रशिक्षित कर -
साधने लगे | एक दिन जब बुद्धसेन का पुत्र नए घोड़े पर चढा उसे साध रहा था कि घोड़ा
बिदक गया |
                    पुत्र घोड़े से नीचे जा गिरा | उसकी एक टांग टूट चुकी थी |
                                     *  *  *  *  *
                     अब वह न तो खेती के काम का रहा और न ही घोड़ा साधने के |
                      बुद्धसेन भला आदमी था उसने सबकी सहायता ही की थी | इसलिए उसके
पुत्र के अपंग हो जाने से लोग बहुत दुखी हुए और दुःख प्रकट करने उसके पास आए मगर
बुद्धसेन न तो दुखी था और न ही उदास |
                        वह दुख प्रकट करने वालों से कहता, "मित्रवर मैं कर्म करने पर विश्वास -
करने वाला व्यक्ति हूं, मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं इस परिस्थिति में भी कुछ भला कर सकता
हूं |"
           लोग उसकी इस सकारात्मक सोच पर ताज्जुब करने लगे |
           बुद्धसेन का बेटा शारिरिक श्रम के योग्य तो रहा नहीं था किन्तु दिमाग का-
बहुत तेज था | बुद्धसेन ने उसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र और गुप्तचर सेवा का अध्ययन करने
के लिए काशी भेज दिया |
           पांच वर्ष के बाद जब बेटा वापस लौटा तो वह आत्मविश्वास से भरपूर एक
अलग व्यक्तित्व का स्वामी बन चुका था |
           उसकी विद्वता की ख्याति जब नवाब रामपुर तक पहुंची तो उन्होंने उसे अपने
किले में बुलवाया और उसकी परीक्षा ली |
                  बुद्धसेन का पुत्र जिसका नाम सत्य सेन था | नवाब द्वारा ली गई हर एक
परीक्षा में खरा उतरा |
                   नवाब रामपुर ने अपने मंत्रीमण्डल से परामर्श किया | सबने एक मत से
राज्य को उसकी सेवाओं से लाभ उठाने का परामर्श दिया |
                    नवाब साहब ने सत्यसेन को अपने मंत्रीमण्डल में मंत्री नियुक्त कर उसे -
वित्त और गुप्तचर विभाग का प्रभारी बना कर सीधे मीर-बख्शी (प्रधान मंत्री) के अधीन कर
दिया |
                  सत्यसेन ने अपनी सम्पूर्ण क्षमता से कार्य प्रारम्भ कर दिया | पहले उसने
राज्य की बिग़ड़ी अर्थ-व्यवस्था को सुधारने के प्रयासों में राज्य के अनावश्यक खर्चों पर -
लगाम लगा कर उन्हें शून्य कर दिया | उससे हुई बचत को उसने राज्य की शांति-व्यवस्था
पर लगा कर शांति-व्यवस्था सही करदी | राज्य में जब सारे कर्मचारियों को वेतन समय -
पर मिलने लगा तो वे मन लगा कर काम करने लगे और शांति-व्यवस्था में अनवरत जुट
गए |
                  दूसरा काम सत्यसेन ने नवाब के राजनैतिक विरोधियों को पकड़ने का किया
ये लोग राज्य में विद्रोह की भावना फैला कर अव्यवस्था के सपने देख रहे थे | इनके राज्य
विरोधी सपनों को सत्यसेन ने अपने गुप्तचरों के माध्यम से नेस्तनाबूद कर दिया |
                  पूरे राज्य में सत्यसेन की वाह-वाही हो गई | पांच साल के थोड़े से समय
में नवाब ने सत्यसेन को मीर बख्शी (प्रधानमंत्री) के सर्वोच्च पद पर नियुक्त कर उसकी -
निष्ठापूर्वक की गई सेवाओं का प्रतिदान किया |
                  पुत्र के प्रधान मंत्री बन जाने के बाद भी बुद्धसेन ने न तो खेमपुर छोड़ा और
न ही कृषि कार्य |
                     जब लोग उसे बधाई देने गए तो उसने मुस्कुराकर कहा," अगर मैं मुसी-
बत के समय अपनी सकारात्मक सोच और साहस का परित्याग कर देता तो क्या मेरा बेटा
आज इतना बड़ा पद पा सकता था | बिल्कुल नहीं |" यह कह कर वह अपने कृषिकार्य -
में लग गया उसे न तो किसी बात का दुख हुआ और न ही बेटे के प्रधानमंत्री बनने का -
हर्ष | वह सब कुछ भूल कर अपने मुख्य कर्म में मस्त था | दुनिया की और बातों से -
उसने कोई सरोकार नहीं रखा था और यही था उसकी एक के बाद एक सफलता का राज |

सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)मोबा.- 9410718777, 08057320999,07579289888