रविवार, 17 जून 2012

उत्तराखण्ड की राजधानी एक विडम्बना


          उत्तराखण्ड की राजधानी एक विडम्बना
                               - डा.राज सक्सेना
          वस्तुतः भारत की स्वतन्त्रता और उत्तराखण्ड का प्रथक अस्तित्व लगभग
समान विडम्बनाओं के अधीन हुआ है|  न भारत का स्वतन्त्र अस्तित्व लेने से पहले
तत्कालीन नेताओं ने कोई होमवर्क किया था और न ही परिस्थितियों के दबाव में बिना
सोचे समझे तात्कालिक राजनैतिक लाभ के लिये उत्तराखण्ड को प्रथक अस्तित्व देने से
पूर्व ही किया गया|  दोनों बार अपने अहम के नशे में चूर सत्तामद से परिपूर्ण,व्यक्ति-
गत हानिलाभ को सामने रख कर कोई भी ठोस निर्णय लेने से बचने वाली,विवादों से
परे रहने की मानसिकता से ग्रसित नौकर शाही पर सबकुछ छोड़ देने की घातक प्रवृति
के अधीन अफसरों पर यह सिरदर्द छोड़ कर राजनीति चादर तान कर सो गई| फलस्व-
रूप अपने प्लाटों और भवनों की मूल्यवृद्धि और मसूरी और देहरादून के मंहगे पब्लिक
स्कूलों में पढ रहे अपने बच्चों के सानिध्यलाभ को दृष्टिगत कर इनके द्वारा देहरादून को
अस्थाई राजधानी के रूप में स्वीकार कराकर कुछ विभागीय भवनों को अधिग्रहित कर
और कुछ किराए के भवनों में राज काज एक दीर्घगामी योजना के अधीन प्रारम्भ कर
दिया गया| यह भी नहीं देखा गया कि सर्वसुखसुविधासम्पन्न राजनीतिकों को तो कोई
फर्क नहीं पड़ा किन्तु कुमांऊ के तवाघाट से खटीमा के सुदूर पूर्ववर्ती क्षेत्र के और के-
वल उनके ही नही पूरे पर्वतीय क्षेत्रों और कुमाऊं की तराई के सभी नागरिकों को किन
कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा यह नहीं सोचा गया | यदि उस समय ही गैर-
सैण में उपलब्ध भवनों और संसाधनों को दीर्घगामी योजना के अन्तर्गत अधिग्रहित
करके एक विकेन्द्रीयित राजधानी की स्थापना कर दी गई होती तो आज स्थिति ही -
दूसरी होती| राजधानी के विकेन्द्रीयित कार्यालयों को हाई टैक टैक्नालौजी के अन्तर्गत
गैर सैण में अवस्थित मुख्य राजधानी जिसमे मात्र विधान सभा और सचिवालय ही
होता से प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अवस्थित विभागाध्यक्षों के कार्यालयों से जोड़
 और वीडियोकांफ्रैंसिंग के माध्यम से एकीकृत करके कार्यसंचालन की परियोजना
पर काम किया जाता तो प्रदेश की स्थिति ही दूसरी होती|
                     इससे एक ओर तो देहरादून जैसे शान्त और सुन्दर नगर का कंक्रीट
के जंगल में परिवर्तन हो गया तो दूसरी ओर उसके एक मंहगे शहर के रूप परि-
वर्तन के कारण छोटे-छोटे कामों के लिए भी अपने घर से देहरादून जाने को -
मजबूर आर्थिक रूप से विपन्न नागरिकों के लिये राजधानी जाना और वहां दो
दिन मात्र रूकना भी असंभव हो गया| स्थिति यह है कि पिथौरागढ के उत्तर सी-
मावर्त्ती क्षेत्र से देहरादून जाने वाले व्यक्ति को देश की राजधानी दिल्ली जाना ज्यादा
आसान है| अपेक्षाकृत ज्यादा सस्ता भी|
                       वैसे सत्यता यह भी है कि गैर सैण में राजधानी की परिकल्पना -
भावात्मकरूप से तो ठीक थी साथ ही प्रदेश के हर क्षेत्र से लगभग समान दूरी भी
इसका धनात्मक पक्ष था किन्तु एकीकृत राजधानी के रूप में इसके कई बहुत ही


                                       -2-
ऋणात्मक पक्ष भी थे जिन पर भावावेश में विचार किया भी गया तो उन्हें भी -
समस्याओं के अपने आप निराकरण की मानसिकता के चलते दरकिनार कर दिया
गया| शायद यही कारण है कि अधिक व्यवहारिक न होने के कारण मजबूरी में ही
सही देहरादून की स्वीकार्यता में अभिवृद्धि हो रही है और शायद दस साल के बाद
तो इसका नाम लेवा भी न रहे, अगर राजनीति आड़े न आए तो|
                   उत्तराखण्ड वस्तुतः तीन भिन्न सांस्कृतिक संस्कृतियों से मिल कर
बना है| कुमांऊनी,गढवाली और मैदानी| यहभी एक विडम्बना ही है कि तीनों -
अपनी पहचान और संस्कृति के प्रति बहुत भावनात्मक लगाव तो रखते ही उसे
बनाए रखने के प्रति भी बहुत जागरूक रहते है| राजधानी गढवाल के अन्दर हो
जाने से कुमाऊंनी और गढवाली संस्कृतियों में टकराव की आशंका बढ गई है|एक
खामोश तनातनी देहरादून में बसे गढवाली,कुमाऊंनी और मैदानी प्रशासनिक अमले
में महसूस होती है,जो कोई गुल खिलाए या न खिलाए एक अव्यवस्था तो पैदा-
कर ही सकती है अब न सही कभी भी?
           यदि उत्तराखण्ड के सृजन के समय थोड़ा सा होमवर्क करके अस्थाई
राजधानी कालागढ की सहज उपलब्ध इरीगेशन कालोनी जो कुमाऊं,गढवाल के पर्व-
तीय और मैदानी क्षेत्रों का प्राकृतिक संगम है तथा संस्कृतियों का भी स्वाभाविक -
संगम होनेके नाते,बनाई जाती तो कुछ वर्षों में सहज स्वीकार्य हो जाती बिना किसी
सांस्कृतिक,आर्थिक , राजनैतिक , सामाजिक और क्षेत्रमूलक समस्या के|  यद्यपि  -
इससे गैरसैण में राजधानी न बन पाने की कसक बिल्कुल तो खत्म नहीं होती मगर
अत्यल्प जरूर हो जाती और क्षेत्रीय असंतुलन की शिकायत के निराकरण के साथ-
साथ हर सुदूरवर्ती क्षेत्र से समान दूरी इसकी विशेषता बन जाती| कम धन से ही
राजधानी का चहूंमुखी विकास संभव होता अलग से|
                        खैर 'बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय'अब समय आ गया
है कि बाकी बचे देहरादून पर इतना दबाव न डाला जाय कि वह फट पड़े| इसका -
सब से सस्ता और सरल उपाय यह है कि थोडा अधिक होम वर्क करके, देहरादून में
अवस्थित कार्यालयों का विकेन्द्रीयकरण करके उन्हें या तो कमिश्नरी मुख्यालयों(गढ-
वाल के लिये ये ऋषिकेश अवस्थित खाली पड़े गो लोक,आई.वी.आर.आई कालोनी)
में स्थानान्तरित किया जाय या फिर नष्ट हो रही कालागढ कालोनी के मरम्मतयोग्य
भवानों में| साथ ही सिटीजन चार्टर बना कर क्षेत्रीय और जिलास्तरीय अधिकारियों
को अधिक शक्तियां प्रदान कर उन्हें अपने क्षेत्र के ग्रामों में कमसे कम तीन माह में
एक रात्रि शिविर करके स्थानीय समस्याओं के स्थलीय निराकरण को विवश किया
जाय| इस कार्य को उनके प्रोन्नत नियमों में प्राथमिकता प्रदान की जाए| ताकि -
वास्तव में कार्य और जनता का दुख-दर्द समझने वाले अधिकारी हैं, ही प्रोन्नति पा
सकें अपने को जनता का शासक समझने वाले अधिकारियों की नाक में नकेल भी
डाली जा सके|
                                               सम्पर्क-धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308
                                                     मो. 9410718777,8057320999
       

गुरुवार, 14 जून 2012

patrottar


Thursday, June 14, 2012
आदरणीय तिवारी जी,                
              सादर चरण स्पर्श | आशा है आप स्वस्थ एवं सानन्द होंगे|
तीन चार दिन पूर्व आपसे हुई टेलीवार्ता के उपरान्त कल आपका/थपलियाल जी का
कृपापत्र प्राप्त हुआ| मैं वर्तमान में कुछ अर्थाभाव में चल रहा हूं इस लिये मात्र तन
और मन से ही आपका पूर्ण सहयोग कर सकता हूं| इसके लिये मैं पूर्व से ही वचन
बद्ध हूं|
               आशा है आप कृपाभाव बनाए रखेंगे और यथायोग्य सेवा हेतु
याद करते रहेंगे|
                                आदर सहित|
                                       आपका अनुज,




                                        (डा.राज सक्सेना)

मंगलवार, 12 जून 2012

कवित्त


           
             कवित्त
             --------
             हिन्दी
जन्मी जहां हिन्दी,जिन्दगी के श्रेष्ट दिन,
दासी के समान हाय,रोकर बिताए है |
हिन्दी में बोलना हिन्द में ही हीन हुआ,
बोलता जो दण्ड और ठोकर  खाए है |
अंग्रेजी अमरबेल,अफसर सहयोग से,
बरजोर होके हिन्दी तरु पर छाए  है |
बेबस है'राज'अब,निर्धन कान्वेन्ट में,
'चिल्ड्रेन'नौकरी की आसकर पढाए है |

हिन्दी ही हिन्द में हेय हुई हाय क्यों?,
राजरानी आसन पर आज हम धर दें |
हिन्दी का ध्वजदण्ड गाढदें जगह-जगह,
इसकी पताका को प्रचण्डतम कर  दें |
रंग बदरंग जो किये हैं राजनीति ने,
आओ नवरंग हर ओर हम  भर  दें |
एक साथ मिलकर पुकार उठें'राज'हम,
भाषा है राष्ट्र की, घोष हम कर  दें |

हिन्दी को दीन-हीन,करते जो बुद्धिहीन,
सत्ता से विहीन, ऐसे दुष्ट  कर वाइए |
भारत की खाते और गाते इंग्लैण्ड की,
ऐसे राष्ट्रद्रोही इस,  राष्ट्र से भगाइए |
बेचरहे मां को निजस्वार्थ के अधीन जो,
ऐसे सत्तासीन सब,  पद से हटाइए |
हिन्दी से प्यार करें,हिन्दी में बात करें,
हिन्दी में काम करें,ऐसे लोग लाइए |



            प्रदूषण
           -------
धूसरित वसुधा, हरित हम कर दें,
दूषणप्रदूषण का जहां नहीं भय हो |
सप्त रंग भर के बना दें इसे दर्शनीय,
आपस में सब की तालमेल लय हो |
देती प्रकृति हमें,अन्न,जल,वायु सभी,
तारतम्य इनका,कभी भी नहीं क्षय हो |
धरती को जिसने बनाया रूपवान उस,
निराकार,निर्देह ईश्वर  की  जय हो |

चित्र की तरह इस धरा को सजा दें हम,
हो गए जो रंग-बदरंग  फिर  भर  दें |
कण-कण की कोख से फूटे हरियाली अब,
उसकी  ऐसी स्थिति अब हम कर  दें |
पीढियां याद रखें  हमको हमेशा  बस,
प्रकृति को दर्शनीय श्रेष्टता  शिखर  दें |
बोल उठे आप हरियाली  संगीत-मय,
ऐसी नवचेतना के, हम इसे स्वर दें |  

रविवार, 10 जून 2012

email gyanpress


 विज्ञान-कुण्डलियां
गाड़ी पर उल्टा लिखा, एम्बुलेंस क्यों मित्र |
आगे  गाड़ी जा रही, मिले मिरर को चित्र |
मिले मिरर को चित्र, सदा   उल्टा आएगा ,
सीधा लिख दें अगर,  पढा   कैसे जाएगा |
कहे'राजकविराय',  इसी से उल्टा लिखते,
बैकव्यु मिरर में देख, उसे हम सीधा पढते |









 64      
जले बल्ब स्विचआन से,ट्यूब लगाये देर |
पप्पू के मस्तिष्क में,घूम रहा  यह फेर |
घूम रहा यह फेर, सुनो पप्पू   विज्ञानी,
ट्यूब बिजली के मध्य चोक,स्टार्टर ज्ञानी |
कहे'राजकविराय',पहुंचती जब दोनों  में,
लेती थोड़ी देर , इसी से वह उठने  में |










 65        
पप्पू मारे हाथ, समझ में कुछ न आता |
क्यों आता है ज्वार,और क्यों आता भाटा |
और् क्यों आता भाटा,लहर यूं बनती क्यों है,
ऊंची उठती लहर,पुनः फिर गिरती क्यों है |
कहे'राज' जब गुरुत्वचन्दा ज्यादा हो जाता,
इसी वजह से नित्य,ज्वार और भाटा आता |












66
         
पप्पू फ्रिज जब खोलता,फ्रीजर ऊपर होय |
सब में ऊपर देखकर,सिर धुनना ही होय |
सिरधुनना ही होय,खेल ये समझ नआया ,
फ्रीजर ऊपर बना रहा है,हर फ्रिज  वाला |
कहे'राज'हवा गर्म, नीचे से ऊपर उठती,
ऊपर फ्रीजर से टकराकर, ठंडी हो  जल्दी |










67
         
पृथ्वी अपने अक्ष पर, झुक साढे  तेईस |
करती है वह परिक्रमा,गिन कर पूरी तीस |
गिनकर पूरी तीस,ऋतु बदले सूर्य किरन से,
मध्य, मकर, कर्क रेखा पर चाल बदल के |
कहे'राजकविराय', गर्म-ठंडी या तम देखो,
सीधी पड़ती गर्म , नही तो ठंडा क्रम देखो |













        68  
गरम करो जब दूध को,उफन सिरे से जाय |
पानी जितना भी करो, ना उफने जल जाय |
ना उफने जल जाय, भेद यह समझ नआया,
पप्पू ने पापा को, अपना यह प्रश्न  बताया |
कहे'राज'दूध में जमती परत भाप न निकले,
अन्दर भभके  भाप, दूध संग लेकर उफने |


अब भारत है तुम्हें  बचाना


अपनों से लुटपिट कर हम तो,
नही लिख सके नया फसाना |
भारत  की   समृद्द     संस्कृति,
बच्चो अब    है तुम्हें बचाना ||

मची   हुई   है खुली  लूट जो,
कैसे  उस  पर  रोक लगेगी |
बापू   ने    जो सपना    देखा,
वैसी   दुनिया   कभी मिलेगी ?
117
सत्य, अहिंसा, प्रेम देश में,-
सिर्फ तुम्हारे जिम्मे लाना |
भारत  की समृद्द संस्कृति,
बच्चो अब है तुम्हें बचाना |

सिर्फ  लंगोटी  जैसी   धोती,
मन में लेकर स्वप्न सुहाना |
बुनना   चाहा  था  बापू   ने,
इस    भारत का ताना-बाना |

बापू    के   सारे सपने अब,-
खींच धरा पर तुमने लाना |
भारत की    समृद्द संस्कृति,
बच्चो अब है तुम्हें बचाना |
118
भारत मां के लाज वस्त्र तक,
लूट रहे हैं   मिल कर सारे |
हाथ बांध      हम देख रहे हैं,
इनके हर   करतब टकियारे |

चट  करने की  ना है सीमा ,
खाते हैं पशु  तक का दाना |
भारत की   समृद्द - संस्कृति,
बच्चो अब   है तुम्हें बचाना |


   मानव सेवा
मानव सेवा में निज मन को,
हर समय सदा तैयार रखो |
तन और किसी के काम आये,
यह सोच सदा हर बार रखो |

जीवन है चन्द  बहारों का,-
इन चन्द बहारों को लेकर  |
आनन्द उठाओ जीने  का,
हर घड़ी समर्पण से जीकर |

हर पल हर सेवा में तत्पर,
तन,मन,धन,परिवार करो |
मानव सेवा में निज मन को,
हर समय सदा तैयार रखो |
120
कुछ जीते जीवन बदतर सा,
इनको तुम जीना सिखलाओ |
जो नर्क   भोगते    जीवन में,
एक झलक स्वर्ग की दिखलाओ |

जो दीन दुखी हैं सड़कों पर,
उनका भी तुम सत्कार  करो |
मानव सेवा में निज मन को,
हर समय सदा तैयार रखो |



  अप्रैल फूल बनाया
चतुर्थ मास के प्रथम दिवस को,
उल्लू     के    मन   आया |
रहे  बनाते   उल्लू     हमको,
दिवस      हमारा     आया |

मैं भी आज    स्वंय  सरीखा,
उल्लू        इन्हें    बनाऊं |
अपने    मोबा इल से  झूठे,
कुछ       मैसेज  भिजवाऊं |
124
भैंस वती को  'मैसेज'   भेजा,
ब्युटी  पार्लर         जाओ |
क्रीम  बनाई एक    उन्होंने,
गोरी     तुम   हो   आओ |

गधे राम को   भेजा 'मैसेज',
सुन्दर - वन   में    जाओ |
वहां  जमी  है अक्लघास एक,
चर कर      अक्ल  बढाओ |

'मैसेज  भेजा चूहे   जी को,
लोमड़  -  वैद्य     पटाओ |
सिंह - राज जो खाते  गोली,
खाकर   कैट       भगाओ |
125
बिल्ली   को  भेजा 'संदेसा',
'बन्दर्-मुनि' पर    जाओ |
सम्मोहन का मंत्र सीख कर ,
मोटे - रैट        पटाओ |

भेज  संदेशे   उल्लू - राजा,
मन ही मन       इतराये |
सन्देशे   सब   भेजे    समझे,
सैण्ड बटन को   बिना दबाये |



 सफलता-सूत्र
नन्हे  बच्चे  सा भोलापन,
लेकर तुम मनके आंगन में |
रस वर्षा ओस समान करो,
इस धराधाम के  प्रागंण में |

रख कोमलमन कछुए जैसा,
ऊपर से सदा  कठोर रहो |
गतिमान रहो मछली जैसे,
साहस में बाघ समान रहो | |

सागर से सीखो आत्मसात,
भरपूर हलाहल पी जाना |
बदले में  मोती और   वर्षा ,
अनवरत सभी पर बरसाना |

फैलो तो गगन सरीखे हो-,
पूरी धरती को ढक डालो |
जो मिले तुरत प्रतिदान करो,
अमृत की वर्षा कर डालो |

सेवा निःस्वार्थ पवन से लो,
अविराम रहे  जो सेवा में |
रख सोच यही अपने मन में,
लगजाओ सततजनसेवा में |

बांटो जग भर को प्रकाश ,
दीपक से भाव जगाओ तुम |
निर्लिप्त भाव से उजियारा,
सारे जग पर बरसाओ तुम |

धरती से ले लो वीत-राग,
दुःखदर्द सहन करके जीना |
मिलते हों दर्द अगर कोई,
हंसते - हंसते   आंसू  पीना |

झरने से सीखो सुख-वर्षा,
बरसो नित पूरी धरती में |
दुख भरी अगर आएं घड़ियां,
उनमें भी नाचो मस्ती में |

चन्दा से लेकर शीतलता ,
भावों में अपने भर डालो |
तारों से सीखो अविचलता,
दृढ रहो जो निश्चय कर डालो |

वृक्षों   से   बनो   उदारमना,
मारें पत्थर तुम फल दे दो |
तपती दोपहरी आए पथिक,
छाया उसको   शीतल दे दो |

कोयल समान    मीठी बोली,
अविरल बहने दो   वाणी में |
श्वानों से स्वामिभक्ति लेकर,
भर दो जग के हर प्राणी में |

ये  मंत्र  सफलता  पाने   के,
जीवन   में जो    अपनाएगा |
निर्लिप्त  सुखी और सद्-जीवन,
वह  अपना  सदा  बिताएगा |



6
                                             

समीक्षा बाल गंगा
‘बाल गंगा‘ डाॅ० राज सक्सेना द्वारा रचित बाल गीतों का संकलन है

जिसके समर्पण  में सक्सेना जी ने लिखा है-
बाल गंगा का समर्पण आपको श्रीमान है,
है    नहीं    संजाल    शब्दों    का,
हृदय        का       गान      है।
बालपन में लौटकर जो कुछ स्वयं अनुभव किया,
भाव वह मैंने सशक्त हर समर्पण कर दिया।
बालगंगा में लगभग 110 बालगीत संग्रहीत हैं। निश्चय ही यह रचनाएंे
उन्हीं अनुभवों को आधार बनाकर लिखी गई हैं जिसे हर आदमी ने
अपने बचपन में कभी न कभी जिया है। इन बाल गीतों में बचपन के
 अनेक रंग हैं। हर बच्चे को स्कूल जाने का झंझट परेशान करता है।
 सक्सेना जी ने लिखा है-
‘सूरज तुम क्यों रोज निकलते
छुट्टी  कभी नहीं  क्यों  जाते
भोर  हुई  माँ चिल्ला  उठती
उठ  बेटा  सूरज  उग आया
आँखें  खोलो झप-झप जातीं
सिकुड सिमट अलसाती काया‘
अपने घर को देखकर हर किसी ने बचपन में सोचा होगा कितना अच्छा
होता कि घर में पहिए लगे होते जहाँ मन चाहा उठा ले जाते-
‘माँ पहिए लगवाले घर में
सचल  भवन  हो जाएगा
पापा रखलें एक ड्राडवर
जो  हर  जगह घुमाएगा‘
पुराने नाते नए विचारों के साथ कैसा अनूठा प्रयोग है-
कैसा मामा, किसका मामा
चंदा लगता किसका मामा
×××××××××××××××
कभी नहीं बाजार घुमाया
कभी नहीं पिज्जा खिलवाया
न बन्दर की खों-खों करके
जब रोते हम कभी हंसाया′
मगर इन गीतों में केवल मनोंरजन ही नहीं है बल्कि इनमें ज्ञान विज्ञान
 के भंडार को बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया गया है जिसे बच्चे बड़ी
 आसानी से ग्रहण कर सकते हैं। विज्ञान कुंडलियाँ इनका श्रेष्ठ उदाहरण हैं-
′गाड़ी पर उल्टा लिखा एम्बुलैंस क्यों मित्र
आगे गाड़ी जा रही मिले मिरर को चित्र
मिले मिरर को चित्र सदा उल्टा आएगा
सीधा लिख दे अगर पढ़ा कैसे जाएगा
कहें ‘राज कविराय‘ इसी से उल्टा लिखते
वैकव्यु मिरर में देख उसे हम सीधा पढ़ते′
डाॅ० राज की विज्ञान कुंडलियाँ उनके विज्ञान संबंधी ज्ञान को दर्शाती हैं।
बाल गंगा में बालकों के ज्ञानबर्द्धन के लिए उनसे संबंधित सभी विषयांे
पर बड़ी सरल, सहज भाषा में लेखनी चलाई गई है। माँ सरस्वती की वंदना,
 उज्जवल उत्तराखण्ड से प्रारम्भ से एक सवाल-हिन्दु,मुस्लिम क्या होते हैं?
 हिमालय, नहीं समझते कम, आज सुना एक नई कहानी, बाल दिवस पर
सुनले नानी-रविवार शीर्षक से कविताएं हैं। आज़ादी सुन मेरी बात, में बच्चे
 अमीरों के नहीं गरीबों के भी हैं जो झोपडियों में रहते है उनके दर्द को बड़ी
 खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है-
‘ये स्लम बस्ती है भारत की इसको सब कहते हैं कलंक
कितनी कोठी खाली सूनी-दिन रात यहा मनता बसन्त
परिवार आठ का रहता है एक आठ-आठ के कमरे मंे
पीढ़ी कमरे में जनी गई त्यौहार मने सब कमरे में‘
एक से एक बढकर कविताएं हैं। दुखियों पर दया, तीनों बन्दर, जन्म दिवस,
आदर्श दिन-चर्या, बच्चों को नैतिक शिक्षा प्रदान करती हैं। गौरेया, हरित बनाएं,
 पेड न होते, पर्यावरण संबंधी कविताएं हैं। गणतंत्र दिवस, बाल दिवस, कथा
शहीद ऊधम सिंह की, चन्द्रशेखर आज़ाद मंे राष्ट्रीयता के स्वर हैं।
सभी गीत सरल, सुबोध भाषा में रचे गए हैं जिनमें प्रचलित शब्दांे को भले
ही वह वैज्ञानिक शब्दावली के हों के साथ यथावत प्रस्तुत किया है जिन्हें बच्चे
 आसानी से समझ सकते है। गीतों में लयात्मक एवं ध्वन्यात्मकता का सम्पूर्ण
 ध्यान रखा हैं। बाल गंगा के सभी गीत नवीन विचार शैली लिए हुए उत्कृष्ट कोटि हैं।
 बाल साहित्य के भंडार को समृद्ध करने के लिए राज सक्सेना को हृार्दिक बधाई।
सभी विद्यालयों में बाल गंगा पुस्तक संजोई जाए ऐसा मेरा अभिमत है।
                           
स्नेह लता
1/309,विकास नगर, लखनऊ










शुक्रवार, 8 जून 2012

समीक्षा- अवधी तथा कश्मीरी लोकगीतों मे लोकतत्व




           समीक्षा-   अवधी तथा कश्मीरी लोकगीतों मे लोकतत्व
                                         समीक्षक-डा.राज सक्सेना
        किसी सामान्य से विषय पर जिस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका हो लिख लेना
बहुत सामान्य सी बात है|  इस तरह के लेखन में कोई बहुत ज्यादा मेहनत की भी आव-
श्यकता नहीं होती सामान्य पत्रिकाओं में भी अनेक सन्दर्भ मिल जाते हैं जिन्हें उठा कर
कहीं भी फिट कर देना भी एक सामान्य सी बात है|  किन्तु एक सामान्य से विषय  को
यदि अतिविशिष्ट स्तर देकर उस पर अतिविशिष्ट सामग्री, सन्दर्भ और समन्वित सदभाव -
का समुच्चय कर उसे अतिविशिष्ट लोगों के लिये लिखा जाय तो वह एक यादगार बन -
जाता है, अमर हो जाता है और विषय का दर्पण हो जाता है, और तो और सम्पूर्ण -
विषय की लाल किताब बन जाता है|
         उपरोक्त शब्दों को अगर डा.बीना बुदकी की सद्यप्रकाशित सामान्य विषय
की असामान्य पुस्तक,' अवधी तथा कश्मीरी लोकगीतों में लोकतत्व - समाजिक,
सांस्कृ-तिक एंव धार्मिक सन्दर्भ में ' पर परीक्षित किया जाय तो सम्भवतः आग्रहों के
साथ पुस्तक देखने वाले दुराग्रही को भी कथन में नब्बे प्रतिशत से अधिक सत्यता लगेगी|
         प्रारम्भ करते हैं आवरण से|  आवरण का चयन, उसका रंग संयोजन और
आंतरिक पाठ्य सामग्री की स्पष्ट झलक मारते चित्र लेखिका की सुरूचिपूर्ण सोच और
स्पष्ट नजरिये की दुहाई पुस्तक पकड़ते ही दे देते हैं| पाठक पुस्तक हाथ में लेते  ही
उसे खोलने और पढने के लिये विवश न हो जाए तो रचना ही क्या| यह कथन भी
पुस्तक हाथ में लेते ही सत्य प्रतीत होने लगता है| सोने पर सुहागा अच्छा और -
मंहगा कागज त्रुटिहीन सुन्दर अक्षरों में छपाई पुस्तक को पाठक की नजर में कुछ -
अधिक महत्वपूर्ण बना देते हैं| एक सौ तिहत्तर पृष्टों की किताब को इस समयाभाव-
ग्रसित जनसामान्य के लिये पढने के लिये खोलना ही एक साहसिक कार्य है| किन्तु
पुस्तक खोल कर एक नजर  देखने का खतरा मोल लेना ही पाठक के गले पड़ जाता
है और एक पंक्ति पढ कर पढना बन्द कर देने के इरादे से पुस्तक खोलने वाला पंक्ति
दर पंक्ति पढने के लिये विवश हो जाता है| किसी अत्यन्त महत्वपूंर्ण काम से पढना
बन्द कर देने वाला भी पहली फुरसत में मौका मिलते ही आगे पढना प्रारम्भ कर -
देता है| यह तो हुई इस असामान्य सामाजिक,सांस्कृतिक और धार्मिक विवेचना लोक
गीतों के सन्दर्भ में करने वाली विशेष पुस्तक के बाह्य कलेवर की बात  और अब बात
करें आन्तरिक पठनीय सामग्री की |
                  इस असामान्य विवेचना-ग्रंथ का मन्तव्य् भी एक असामान्य हस्ती ने लिखा
है| जिन्हें हिन्दी  का  साहित्य जगत मसीहा की तरह मानता और जानता है| श्रद्धेय -
राजेन्द्र अवस्थी जी ने पुस्तक के पूर्वपृष्ठ में ही पुस्तक का सार और लेखिका का मन्तव्य
स्पष्ट करके इसे सामान्य श्रेणी की पुस्तकों से अलग घोषित कर इसकी असमान्यता को -

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भी स्पष्ट कर दिया है और यही घोषणा की है प्रस्तावना में कश्मीरी साहित्यप्रवर और प्र-
खर वक्ता प्रो.चमन लाल सप्रू जी ने|
        और अब आती है बारी इस असामान्य पुस्तक की  लेखिका की| सामान्य से
कुछ अलग हट कर सृजन करने वाली विद्वान लेखिका ने पुस्तक की भूमिका में ही स्पष्ट
करने का प्रयास किया है कि सामान्य विषयों से अलग हट कर लिखने की लालसा और
अदम्य जिज्ञासा तथा विकट धैर्यपूर्ण साहस ने ही उनसे इस कालजयी रचना का सृजन
कराया है| अवध की निराली शाम और धरती के स्वर्ग दोनों का निकटता से रसपान -
करने वाली लेखिका ने सम्भवतः सामान्य विषय को, असामान्य विषय और सामग्री के
साथ असामान्य प्रस्तुतीकरण की कला, इन दोनों असामान्य क्षेत्रों के समन्वय से ही प्राप्त
की है| कश्मीर में स्वंय भोगे यथार्थ का भी प्रभाव तो पड़ना ही था,सो पड़ा ही| यह
भी इसे असामान्य बनाने में सहायक ही हुआ है, केवल सहायक ही नहीं हुआ है अपितु
मन को विषय से जोड़ने में सफल भी हुआ है|
           लेखिका ने दो संस्कृतियों को साथ जिया है, प्रारम्भ में मन से कश्मीर
और भौतिक वातावरण का पूर्वांचलीय परिवेश उनसे, अलग हट कर सृजन का आग्रह ही
करता रहा होगा जिसकी परिणति इस पुस्तक के रुप में सामने आती है| उल्लेखनीय है
कि लेखिका ने स्वंय स्वीकार किया है, "य़ूं तो बचपन से घर का माहौल तथा कश्मीरी
 भाषा ही बोली जाती थी| लेकिन हमेशा मह्सूस होता कि मेरी एक नहीं दो मांऐं हैं, एक
 अवधी दूसरी कश्मीरी| दोनों के प्रति मेरी ममता थी|" ध्यान दें यहां भी लेखिका ने परम्परा
से ह्ट कर मातृभाषा को दूसरा स्थान दिया है| अवधी को पहला स्थान देकर अपनी विलक्ष-
णता का खुला प्रदर्शन बीना जी ने कर ही दिया| यही राष्ट्रीयता और सार्वभौमिकता का प्रतीक
है जो उन्हें और उनके साहित्य को अलग तथा असामान्य बनाता है|
                     सीधे विषय पर आने से पूर्व लेखिका ने यह उचित समझा कि जन-
सामान्य पाठक को लोक का अर्थ और परिभाषा के साथ दोनों भाषाओं का संक्षिप्त
किन्तु स्पष्ट परिचय कराया जाए ताकि पढते समय कहीं दिग्भ्रमित होने की नौबत न
आए| यह आवश्यक सुकर्म करने के उपरान्त ही वे मुख्य विषय पर आती हैं और कश्मीरी के
धार्मिक लोकगीतों से प्रारम्भ कर जन्म से मृत्यु संस्कार  तक के लोकगीतों का समुच्चय
प्रस्तुत करती हैं| हिन्दू संस्कृति में मनुष्य के सोलह संस्कार सुनिश्चत हैं,वस्तुतः यही
सोलह संस्कार जन्म से पूर्व से ही समाज को नवागत और जन्म के पश्चात नवागत को
समाज से अंतरंगता के कारक बनते हैं| इनकी भौतिक महत्ता जो बाहर से नहीं समझी
जाती किन्तु हमारे ऋषियों ने इस मनोविज्ञान को समझा और एक जटिल तथा अटूट -
सामाजिक ढांचे की संरचना में गर्भाधान से ही उसे सामाजिक मान्यता और अंतरगता
प्रदान करदी|  संस्कृति के इसी स्वरूप ने भयक़ंर झंझावातों में भी संस्कृति को बिखरने
नहीं दिया बल्कि  उसे और मजबूती से बांध दिया|  स्थानीय लोकगीतों के माध्यम से

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महिलाओं ने इस मशाल को आज भी जला रखा है,अक्ष्णु रखा है|  इन्हीं लोकगीतों के
माध्यम मात्र से जो गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन(तीनों जन्मपूर्व)संस्कार
से पुत्र जन्म,श्रान सौ'दर(छठी पर),मास नेथर(एक माह पर),अन्न प्राशन(छैः-
माह पर),ज़रकासय(मुण्डन),विद्यारम्भ पर,यज्ञोपवीत(आठ वर्ष पर), विवाह -
संस्कार पर और इन संस्कारों से सम्बन्धित उपकर्मों के समय गाये जाते हैं,महि-
लाएं अपने स्तर से अपनी सांस्कृतिक विरासत को पीढियों तक सहेजे रहती हैं| यूं
तो मृत्यु के उपरान्त भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न जातियों उप जातियों में शोक
प्रकट करने के तरीके हैं किन्तू लेखिका ने कश्मीर कि विशिष्ट पारम्परिक विरासत के
रूप में मृत्योपरान्त गाये जाने वाले लोकगीतों का बड़ा सजीव व मार्मिक वर्णन -
किया है| लेखिका के अनुसार यह गीत आम महिलाएं नहीं गाती हैं बल्कि कुछ पे-
शेवर महिलाएं जिन्हें 'वारेन्य' या 'वानुवाजेन्य'कहा जाता है गाती हैं| इन शोक -
गीतों को पुरूष नहीं गाते हैं अपितु वारेन्य महिलाओं के एक पंक्ति गाने पर अन्य
उपस्थित महिलाएं उसे दोहराती हैं| यह है कश्मीर की एक विशिष्ट परम्परा जिसे -
लेखिका ने अन्य लोगों को अवगत कराया है| इसी क्रम में इस संस्कार के अन्य
कर्मकाण्डों के समय भी गाए जाने वाले लोकगीतों का सजीव वर्णन लेखिका द्वारा
करके कश्मीरी संस्कृति का विशिष्ट पक्ष उजागर किया गया है|
            अवधी में भी मुहर्रम के अवसर पर हसन और हुसैन की शहादत से
सम्बन्धित लोकगीतों पर खोज कर और उन्हे पाठको को इस पुस्तक के माध्यम से
उपलब्ध करा कर भी विद्वान लेखिका ने एक नई पहल की है और इन गीतों को भी
लोकगीतों में सम्मिलित कर दिया है| क्या यह असामान्यता का प्रतीक नहीं है?.
           सामान्य विषय को और असामान्य बनाते हुए लेखिका लोकगीतों की
गहराई में जाकर वहां से कश्मीर के विभिन्न जातियों, कृषि सम्बन्धी,बच्चों के खेल-
गीत, गरीबी और धार्मिक गीतों का अलबेला पिटारा पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करती
हैं, जिससे नायाब और दुर्लभ मोती निकल कर पाठकों को सोच की एक नई दिशा
उपलब्ध कराते हैं| लेखिका यहीं नहीं रुकती वे यह मोती अवधी में भी खोज लाती हैं
और उन्हें अवधी में विभिन्न जातियों के लोकगीतों के रूप में परोसती हैं|
            अपने अध्ययन और मनन को विराट रूप देते हुए वे लोकगीतों पर
ही केन्द्रित नहीं रह्तीं अपितु  लोकगीतों के आनुषंगिक क्षेत्र का भी अध्ययन प्रस्तुत
करके अधूरापन पूरा करती हैं| कश्मीरी और अवधी के लोक संगीत और लोक नाटक
अध्याय के रूप में| मुस्लिम लोकगीतों का भी समावेश इस पुस्तक को पठनीय और
संग्रहणीय बनाता है|
                      अन्तिम अध्याय में विद्वान लेखिका ने अवधी और कश्मीरी लोकगीत
का सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक अवदान पर अपने विचार बड़े स्पष्ट रूप

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से रखे हैं| विराट अध्ययन और गंभीर विमर्श के उपरान्त उन्होंने जो मन्थनोपरान्त
मन्तव्य निकाला है वह भारत की अनेकता में एकता की पुष्ठि करता है| वे लिखती
हैं,"कुल मिलाकर यदि देखा जाय तो भारतीय संस्कृति की जो अन्तःसलिला अवध
प्रदेश में अज्स्त्ररूप में प्रवाहित है,उसी प्रकार की सांस्कृतिके और सामाजिक अन्तः-
सलिला कश्मीर में भी निरन्तर प्रवाहित हो रही है| विभिन्न प्रकार के सामाजिक -
और आर्थिक ताने बाने का एक जैसा ही रूप दोनों ही भाषाओं में विद्यमान है जो
कुल मिला कर भारतीय संस्कृति की एकता परिलक्षित करता है|"
          जैसा कि मैंने प्रारम्भ में कहा है यह एक सामान्य विषय की असामान्य
पुस्तक है, इसे मैं पुनः दोहराते हुए इन शब्दों के साथ अंत करता हूं कि अवधी और
कश्मीरी लोकगीतों में लोकतत्व एक धरोहर है, जो हर समाज शास्त्र मे रुचि लेने वाले
जागरूक नागरिक के संग्रह में होना आवश्यक है जिससे जब जो चाहे सम्बन्धित प्रमाण
का खजाना खोल कर इससे उद्धरण ले सके|
          कुल मिला कर पुस्तक निश्चित रूप से असामान्य सामाजिक और सां-
कृतिक सरोकारों के लोकतत्वों का कोष है जो हर घ्रर में रखे जाने योग्य है|
                                           -धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उ.ख.)