मंगलवार, 27 सितंबर 2011

बुजुर्गों के लिये



 
रहें बैठे निठल्ले  भी समय  तो  बीत जायेगा |
मगर जीने की इच्छा का घड़ा सब रीत जायेगा |
मैं बूढा हूं नहीं कुछ हो नही सकता न सोचें ये,
करें कुछ काम जनहित का,बड़ा आनन्द आयेगा |
          -०-
हजारों काम हैं  ऐसे जिन्हें  हम  खुद बना लेंगे |
किसी की जिन्दगी में हम खुशी के पल बढा देंगे |
उठो उठ कर संवारो जिन्दगी के पल जवानों से,-
उन्हें यह गर्व करने दो,कि हम दुनिया सजा देंगे |
          -०-
बिखर जाएं तो पल भर में,मिटा लें अपनी हस्ती को |
संवारें कुछ दिनों में तो, संवारें   एक     बस्ती को |
हमारे पास क्या कम है, झिझकते हम रहें क्युंकर,-
रहे हैं मस्त जब अब तक, जियेंगे  मौज-मस्ती  को |
          -०-
जब आए तो ऊसर था,बसाया है बहारों को |
पसीने से इसे सींचा, तो लाए सुखकी धारों को |
नहीं सोचा अगर होता,नई नस्लों के बारे में,-
तो कैसे झेल पाते हम,विकट तूफां हजारों को |
          -०-
यहां क्या था,हमारी नस्ल केवल जानती है |
हमारी शौर्य शक्ति को, ये धरती  मानती है |
यहां बाहों की ताकत से रहे हैं दोस्त हम जिन्दा,
हमारी बांह की ताकत, धरा पहचानती है |
          -०-
मिलेंगे फिर कभी तुमसे,दिलों मे आस रखते हैं |
करेंगे फिर कभी स्वागत,ये इच्छा खास रखते हैं |
खुशी से कर रहे हैं हम,विदा इन नौजवानों को,-
रहेंगे नौजवां सौ तक, यही विश्वास   करते  हैं |
           -०-
जो आया है उसे तो एक दिन जाना जरुरी है |
मगर हर रस्म दुनिया की, निभाना भी जरुरी है |
जिएंगे जब तलक,जिन्दादिली का पास रक्खेंगे,
भरम कुछ साथ में रख्नना,दिखाना भी जरूरी है |
            -०-

apna banalo

   प्रिय मुझे अपना बनालो
               -डा. राजसक्सेना
पाश में लो बांध मुझको,  एक  नया  संसार ढालो |
ना रहे अस्तित्व मेरा, अंक  में मुझ   को छुपालो |
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

कल्पना से सिर्फ जब मन,है प्रफुल्लित तन मुदित है |
जब मिलन की कामना है, कामना में सब उचित  ह |
ढेर से स्वपनों को जीवन,- दान देकर   जगमगा लो,
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

कुछ दिनों की बात है यह,फिर शमन हो जायगा सब  |
मिल रहा यौवन सतत तब,तन नया सुख पायेगा अब |
पल्लवित नवरूप लेकर,  रूप-यौवन को   सम्भालो ,
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

देह  हों  दोनों  महालय, और  हम  दोनों   प्रवासी  |
प्यार हो बस प्यार उर में, हो नहीं  पल भर  उदासी  |
तुम मुझे दो प्यार अविरल,प्रतिदान  में अनुराग पालो ,
   प्रिय मुझे अपना बनालो |

aa...tan madmaata

   आगया बसन्त तन मदमाता
                    -डा.राजसक्सेना
बासन्ती चूनर लहराता,मद्धम स्वर में हर  क्षण गाता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

   हर लता चाहती लट सुलझे,
   प्रिय के कंपित निज कर से |
   घनघोर घटायें छा    जायें,
   हो पास प्रिय बिजली कड़के |
डर कर लिपटे वह प्रियतम से,लेकर अपना मन थर्राता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

   धरती पर लगे, लगी मेंहदी,
   दर्पण में दिखती छवि प्रिय की |
   मनचातक पियपिय बोल रहा,
   हर दिशा लगे महकी-महकी |
मनकरता तनको दुलराने,इसक्षण प्रियतम आंगन आता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

   आती  पुरवाई  गंध  लिये,
   स्वर्णिम किरनों को संग लिये |
   तन छूने लिपटे भावविव्हल,
   प्रिय सा अनुपम स्पर्श लिये |
प्रिय सा छूजाना अनजाने,हल्का तन-मन को कर जाता |
मदभरा मास आ गया पुनः,मकरन्दी मौसम छलकाता |
   आगया बसन्त तन मदमाता |

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

       चन्द रुबाइयां
चली आई बड़े तड़के,   मेरे घर  पर लिए डोली |
हमारे कान में'अब उठ'किरण कुछ् इस तरह बोली |
मिलन की रात बीती है,मिलन क्षण शेष हैं मन में,
अभी क्यों दे रही दस्तक,अभी आराम  कर भोली |
             -०-
तुम्हारी रेशमी आहट, मेरे  जब   पास आती है |
मिलन की कामनाओं का,मधुर अहसास लाती है |
मुझे अमराइयों के झुटपुटे क्षण याद  आते   हैं,
सितारों से भरा आंगन,मिलन की आस लाती है |
             -०-
तुम्हारी देह    का दर्पण , मेरा  श्रंगार  करता है |
छिपी मन में    अगर पीड़ा,त्वरित संहार करता है |
मिलन सौ    बार होता है,अगर तुमसे अकेले में,
मिलें कुछ और क्षण मुझको,हृदय हर बार करता है |
             -०-
मिलन की प्यास बुझ जाये, कहें ये देह के धागे |
यही  क्षण चक्षु ने चाहा,  यही मन गेह ने चाहे |
रहो सानिध्य में हरदम , यही है कामना प्रियतम,
तुम्हारे साथ क्यों बांधे,  ये हमने स्नेह के धागे |
             -०-
झिड़क सब कामनाओं को,तुम्हारी देह से बाहर निकलता हूं |
मलय  सा   हो गया हल्का, क्षितिज के पार चलता   हूं |
सृजन नव कर दिया हमने , नये संसार  का   प्रियतम ,
धरोहर प्यार की अर्पण ,  तुम्हें  हर  बार   करता   हूं  |
              -०- 

बुधवार, 14 सितंबर 2011

राष्ट्रभाषा


       राष्ट्रभाषा
            -डा.राजसक्सेना
मातृभाषा पर जिसे,अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति, रखता नहीं अधिमान  है |
पूर्ण पशुवत है जिसे,ना शीर्ष पर हो राष्ट्रप्रेम,
सम्पदामय हो,अकिंचन का सही प्रतिमान है |
        -०-
उठो उठकर तलाशें  हम, नई  सम्भावनाओं को |
करें हिन्दी की अब सेवा,करें नव- साधनाओं को,
सरल जीवन,सघन मेहनत,यही चाहा है हिन्दी ने,
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें धारणाओं  को |
        -०-
हमारे दिल में हिन्दी का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से दिल की धड़कन में,दिलेबेताब  बाकी  है |
शहर से उठ गई हिन्दी,हमारे गांव में    लेकिन,
धड़कती है दिलों मे वो,सरो-शादाब    बाकी  है |
        -०-
मैं हिन्दी हूं,मै हिन्दी था,रहूंगा मैं सदा  हिन्दी |
है हिन्दी ही कथा मेरी,रही हमदम सदा  हिन्दी |
नहीं हूं वर्णसंकर मैं,जो बोलूंगा  अलग  भाषा,
मैं भारत मां का बेटा हूं,मैं बोलूंगा सदा हिन्दी  |
        -०-
करेगी देश को जगमग,मुझे विश्वास विश्वास हिन्दी का |
है उत्सव के लिये निशचित,सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौद्ह सितम्बर को,मनाते हैं हम 'हिन्दी डे'-
इसी दिन हम किया करते हैं,तर्पण खास हिन्दी  का |
        -०-
मनाते इस तरह से हम, अजब त्योहार हिन्दी   का |
इकट्ठे हो लिये, मातम मना, हर बार  हिन्दी  का |
बना कर एक खबर भेजी जहां छपता  है   रोजाना-,
फिर अगले दिन पढ़ा करते हैं हम,अखबार हिन्दी का |
        -०-
 

सोमवार, 12 सितंबर 2011


      ब्रजेन्द्र भगत तुमको प्रणाम
                     -डा.राज सक्सेना
मारीशस  जैसा  पुण्य-धाम,
उसमें जन्मा एक पुण्यनाम |
हे राष्ट्रकवि ब्रजेन्द्र  भगत-,
तुमको हिन्दी के शतप्रणाम |

अविराम लिखा इतना तुमने,
हिन्दी में महिमा भरने को |
पचहत्तर कविता लिख डालीं,
सुन्दरतम हिन्दी करने को |

हिन्दी,हिन्दू के  संरक्षक -,
तुमने  इतिहास बनाया है |
हिन्दी - गंगा की धारा को,
तुमने सम्भाष  बनाया है |

सेवा अविरल कर हिन्दी की,
तुम बने,सुशोभित राष्ट्रकवि |
अन्तरतम वीणा झंकृत कर,
दे दिया श्रेष्ट ,बन  महाकवि |

कल्पनालोक में विचरण्-कर ,
तुमने रच डाला सब यथार्थ |
हे राजहन्स कविता युग के ,
रथियों मे शोभित श्रेष्ठ पार्थ |

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

ईद-मुबारक


       ईद-मुबारक
             -डा.राज सक्सेना
ईद  पर  रस्म  है,मिलते  हैं  गले  सब बढ़कर |
चलो मिलकर गले,इस ईद पर हम दोस्त हो जाएं |
          -०-
वस्ल पर रोक लगा दी है,चलो मान गये |
ईद पर दीद न हो, रस्म भी तोड़ी तुमने |
          -०-
ईद पर उनसे कहा,आओ गले मिल जाओ |
दबा के होंठ ये बोले,मिंयां  मुंह धो आओ |
          -०-
जवानी में क़दम रखते ही,जगमग कर दिया आलम |
जवां भरपूर होकर तुम,ग़ज़ब ढ़ाओगे  क्या  जानम |
          -०-
नहीं है उम्र कम लेकिन,बहुत भोले हैं दिल के वो |
किये ज़िद कल से बैठे हैं,दिखाओ दर्दे दिल हमको |
          -०-