गुरुवार, 30 जून 2011

aik ghr chahiye

                    एक घर चाहिए 
                                 - राज सक्सेना 

स्वप्न अपने पूर्ण करने, सबको एक घर चाहिए |
मैं परिंदा हूँ मुझे उड़ने को,       दो    पर    चाहिए |
फ़िक्र-ए-जनता में लगे , रहते हैं सारी उम्र वो- ,
नाश्ते से हर डिनर तक, मॉल  सब तर    चाहिए |
यूँ तो हैं त्यागी पुरुष, दौलत से इनको  काम क्या,
अपने दस्खत तब करेंगे, पहले तै   जर   चाहिए |
काम तब आतीं दुआएं, साफ   दिल  से हों  अता ,
साथ में दरिया-दिली और, चश्म-ए -तर   चाहिए |
इन्सान में खामी न हो , ये तो कभी     होता   नहीं ,
भगवान न बन जाये इन्सां, रहना  कसर  चाहिए |
उड़ते-उड़ते थक कर गिरुं बस,तेरे घर के सामने,
`राज` पल भर ही सही, मुझको भी तो दर चाहिए |

  - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ.ख)
                           मो- 09410718777

बुधवार, 29 जून 2011

roshni ke pl jga

                  रौशनी के पल जगा 
                                - राज सक्सेना 

उठ अँधेरी  रात में कुछ ,  रौशनी  के  पल     जगा |
जिस तरह सम्भव बने,एक जगमगाता कल बना |
स्वप्न क्या-क्या रातभर,सब देखते हैं     नींद   में,
उठ खड़ा हो सत्य की,  उनमें कहीं  कोंपल     लगा |
लोग चलते फिर रहे हैं, धूप  से तन   को      बचा,
धूप से जब हों विकल तब, छाँव का आंचल   सजा |
हो नरम धरती तो आकर, हल चलाना  बात  क्या,
ढूंढ़ कर ऊसर धरा पर, वीर बन कर     हल    चला |
लोग  जब गिरने लगें तो, किस कदर जाते हैं गिर,
जब पतन सम्भव लगे तो, हो खड़ा उठ कर   दिखा |
सह रहे हैं मौन रह कर , अब भी शोषण लोग क्यों,
`राज` अब शोषण नही, कहना उन्हें   केवल  सिखा |

  - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 (उ.ख)
                                 मो- 09410718777

मंगलवार, 28 जून 2011

ujjvl unnt uttrakhand-2

                                  उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड 
                                                              - राज सक्सेना 
सफल-समन्वित,श्रम शुचितालय,
शीर्ष-सुशोभित,  श्रंग -शिवालय   |
विरल-वनस्पति,     विश्रुत-वैभव,
वन धन , पशु धन पूर्ण हिमालय  |
                                 पावस- प्रचुर, प्रकल्पित खंड,
                                 उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |
भाव-भूमि,      भव-भरित प्रभाग,
नंदा,   नयना,            पंच- प्रयाग |
अन्नरत्न  - आपूरित ,      आंगन ,
तन्मित-तरल ,       तराई - भाग  |
                                पावन , पर्यावरण  -  प्रखंड,
                                उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |
कुसुमित-कलियर , कनक-विहार ,
हिममय- हेमकुंड ,           हरिद्वार |
परम- प्रतिष्ठित    चतुषधाम    से,
पावन - द्वैनद   ,       पुलक-प्रसार |  
                                मधु-मंडित, महिमा सचखंड,
                                उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |
सर्व-धर्म,  समुदाय  ,   निवासित ,
शौर्य, सत्य, शुचिता- सहवासित  |
प्रेम- परस्पर ,    पावन-पुलकित ,
मूल-प्रखर ,   गतिशील-प्रवासित |
                                भ्रात- भाव ,भव-भूमि अखंड,
                                उन्नत -उज्ज्वल -उत्तराखंड |

            -धन वर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308 (उत्तराखंड) 
                                       मो- 09410718777

रविवार, 26 जून 2011

26nvri

                    छब्बीस जनवरी 
                                   - राज सक्सेना 
भिन्न सभी से, सबसे न्यारा,भारत का गणतन्त्र हमारा |
बना विश्व में श्रेष्ठ सभी से ,  हमें जान से है यह   प्यारा |
२६ जनवरी का स्वर्णिमदिन, लेकर खुशियाँ आया अनगिन,
इस दिन से मुड कर न देखा, करता देश तरक्की प्रति दिन ,
देख रहा विस्मित जग सारा, भारत का गणतन्त्र  हमारा |

अंतिमजन तक किया समर्पित,किया प्रशासन जनको अर्पित,
दलित-शोषितों को नियमों से, मिली शक्तियाँ श्रेष्ठ अकल्पित ,
पहुंची हर घर तक धारा ,   भारत का गणतन्त्र    हमारा  |

हुयी शक्तियाँ संवैधानिक,  लिखित हो गयीं सब अधिकाधिक,
संविधान अति श्रेष्ठ बना कर, संसद से करवाया   पारित ,
जग में ज्यों चमका ,धुर्व - तारा, भारत का गणतन्त्र हमारा |

शासन जन का , जन के द्वारा, है सशक्त प्रतिनिधि हमारा,
नियम बनाना, राज चलाना, उसमें सिमट गया बल सारा ,
शासक-शासन सभी संवारा ,  भारत का गणतन्त्र हमारा |

     - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

hindi gjl

                               हिंदी गजल 
                                            - राज सक्सेना 
अब तो पारे सी चमकती, हो गयी हिंदी गजल |
मस्त हिरनी सी मचलती,हो गयी हिदी गजल |
दुख्तर-ए-दुष्यंत ने, अब पर निकाले देख लो,
आस्मां की एक परी सी , हो गयी हिंदी गजल |
लेके उर्दू से नफासत , माधुर्य अपना डाल कर,
क्या नशीली बन गयी है, अब नयी हिंदी गजल |
मीर ,ग़ालिब की चहेती, फैज़ के दिल की अज़ीज़,
सबकी चाहत पाके सबकी, हो गयी हिंदी गजल |
तन से हिंदी,मन से हिंदी,ले के  हिंदी    आत्मा,
गोद में हिंदी     के बैठी,  हो गयी    हिंदी गजल   |
शब्द अपने, भाव अपने, छंद भी    अपना तो है,
`राज` अब सबकी चहेती , हो गयी हिंदी गजल |

      - धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308 

mere mn ko

                 मेरे मन को 
                             - राज सक्सेना 
अधर रसपान प्रियतम का, लगा अमृत मेरे मन को |
युगों की प्यास का तर्पण, हुआ अनुभव मेरे तन को |
सभी में कुछ न कुछ कमियां, नहीं कोई कमी तुम में,
सहेजा जिस तरह तुमने, उठी हर एक उलझन    को |
हमें भर पूर जीना है, जियेंगे हम हर एक पल   को,
सिमटकर क्यों जियें करलें ,गठित मजबूत बंधन को |
सुलगती प्यास इस तन में, मगर मन वर्जना में है,
चलो अब खत्म कर दें हम,अजब इस एक अनबन को |
मिलन की कामना मन में, कसक बन कर न रह जाये,
उठो हम एक कर डालें, क्षुधित हो तप रहे      तन को |
न रोको अब करो निश्चय, समा जाओ  मेरे तन में ,
बनाएं `राज` मन्दिर हम, भटकते फिर रहे मन    को |

          - धन वर्षा, हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308

ayodhya faisla

                अयोध्या फैसला 
                                        -राज सक्सेना 
तीन जजों ने कर दिया, निर्णय नया प्रवीन |
पड़ी विवादित भूमि के, करदो हिस्से   तीन |
करदो हिस्से तीन,     बराबर    बाँटो   भाई ,
बना मूंछ का प्रश्न , लड़ो मत छद्म     लड़ाई |
कहे`राज कविराय`,फटे दिल फिरसे  जोड़ो,
`कुटिल धर्म निरपेक्ष,`व्यक्ति से नाता तोड़ो |

हुआ बाबरी का इधर, मुर्दा   तेरह       तीन |
कुटिल साम्प्रदायिक प्रखर,लगे बजाने बीन |
लगे बजाने बीन,  नाग को पुनः जगा   कर,
कर दें मटियामेट , खीर में नमक मिला कर |
कहे`राज कविराय`, राष्ट्र  की    करो भलाई ,
प्रेमभाव की जमी जड़ें, मत खोदो      भाई  |

हाशिम ने दिखला दिए, दिन में   तारे देख |
एक नये इतिहास के, लिखता है अब  लेख |
लिखता है अब लेख, लाभ लडवा  कर लेते ,
उन लोगों को हाशिम ने दिखलाये      ठेंगे |
कहे `राज` हाशिम सपूत ने, पंख    लगाये ,
शायद मसला साथ बैठ कर   हल हो  जाये |

तीनों न्यायाधीश थे,   पके-गुने  श्री  मंत |
हिन्दू-मुस्लिम एक हों,लिए साथमें  संत |
लिए साथ में संत, दूर की दुविधा     सारी,
किन्तु विषैले नाग,कर रहे  पुनः  तैयारी |
कहे `राज कविराय`,नहीं अब चलने वाली,
भस्मासुर की चाल, पड़ेगी उन पर   भारी |

दुष्ट व्यक्ति कहने लगे, निर्णय नहीं सटीक |
प्रथम आस्था-द्रष्टया,मुद्दे सुने   न     ठीक |
मुद्दे सुने न ठीक , इन्हें   कैसे   समझाओ ,
दादा इनके वही,इन्हें क्या सनद दिखाओ |
कहे`राज कविराय`,खेत की नहीं जमीं थी |
पूर्ण देश की भक्ति भावना,वहीं जुडी     थी | 

सुनो मुलायम सब रहो, नहीं तनो इस वख्त |
कुटिल चाल से इस समय,कब्र मिले न तख्त |
कब्र मिले न तख्त,  हाथ  से  दोनों      जाएँ ,
इश्वर और अल्लाह ,घ्रणा  करने   लग  जाएँ |
कहे`राज कविराय`, त्रिशंकू  मत  बन   जाना,
जाग रहा सद-भाव, पुनः  मत  आग   लगाना |

   - धन वर्षा, हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308
          मो- 09410718777

is devbhumi ki dhrti pr

                इस देव भूमि की धरती पर 
                                        - राज सक्सेना 
इस देवभूमि की धरती पर, पानी सा रक्त बहाया है |
इस महादान के बदले  ही, यह अलग राज्य बन पाया है |
तडपे घंटों तुम पड़े-पड़े, ज़ालिम शासन की छाया में ,
उत्तराखंड पर हो शहीद , तुमने इतिहास बनाया है |

हम आज तुम्हारे ही कारण, जीवन के सब सुख पाते हैं,
हो कर शहीद, नवजीवन दे, तुम गये, भूल कब पाते हैं,
यदि होते बीच हमारे तुम , तब दृश्य देख ये भी  लेते,    
 प्रति वर्ष सितम्बर पहली को, रस्में हर  वर्ष निभाते हैं |

बदले में यह कण मात्र नहीं, जो तुमने किया निराला था,
ये भगत सिंह, अशफाकुल्ला, के बलिदानों की माला  था ,
जो शून्य बना न रहने से, प्रतिपूर्ति नहीं हो सकती है,
इस महा समर में तुमने तो,सर्वस्व होम कर डाला    था |

जो सपना देखा था तुमने, वह पूर्ण कभी कर पायेंगे ,
क्या उन सपनों के भवनों को, हम मूर्त-रूप दे पाएंगे,
आओ आह्वान करें मिलकर, हम सपने पूरे करने का,
हर हाथ बढ़े निर्माण हेतु, सपनों का महल बनायेंगे |

केवल नारे और बातों से, सद कार्य नहीं हो पाते हैं,
जो दृढ निश्चय लेकर चलते, पर्वत पर राह बनाते हैं,
बाधा आये संकट आये, रुकना अब तो मंजूर  नहीं
कायर चलते नीचे झुक कर, सर सबके वीर झुकाते हैं |

बलिदान मांगते समर सभी, क्या हमने खून बहाए  हैं,
जो चले शहादत के पथ पर, क्या गीत उन्हीं के गाये हैं,
बलिदान हुए हैं हम पर जो, उनके प्रति  पल भर रुक कर,
क्या अश्रु  कणों के संग कभी, श्रद्धा के सुमन चढाये हैं |

                                        - धन वर्षा, हनुमान मन्दिर,
                                          खटीमा-262302
                                          मो- 09410718777

मंगलवार, 21 जून 2011

jo apna ho


                    जो अपना हो 
                             - राज सक्सेना 
न हो कागज का एक टुकड़ा,न मिलती रोशनाई हो |
जहाँ पढने को बच्चे ने,       दिया-बाती न  पाई  हो |
संभाला होश, खाने को ,    जहाँ खुद ही   कमाना है,
बताओ `राज` इस माहौल में,    कैसे पढ़ाई      हो   |

अँधेरे मुंह पड़े उठना ,     न मेहनत रंग  लाती    हो |
जहाँ फुटपाथ पर सबकी ,  उम्र ही बीत जाती     हो |
बड़ी थोड़ी हुयी लडकी,      सजा कोठे पे       दी    जाये,
इनिं के वोट से भारत में जब सरकार      आती    हो |

नहीं मिलता hai  बहुमत तो,  ये शातिर फन दिखाते हैं |
हजारों देके प्रलोभन,         ये बहुमत     खींच     लाते हैं |
रखेंगे क्रीम के पद    और  ,   पी एम् भी इन्हीं का हो,
ये कह आदेश जनता   का, स्वयम तिकडम भिड़ाते हैं |
इसी सरकार   के   मंत्री ,  खरब    में       घूस      खाते  हैं |  
और इस पैसे    को  वे     स्विस बैंक   में जाकर  छिपाते हैं |
जहाँ   दस लाख   के  पर्दे , बदलवाते    हों     मंत्री       जी,
वहाँ   बच्चों में दस में नौ ,  विरासत भूख      पाते        हैं |

बड़े    विश्वास    से    हमने ,   इन्हें     स्वराज     सौंपा  था |
बना   दें    राम के     जैसा,  इसी     हित ताज    सौंपा  था |
मगर बदले         में       हमको ये ,   तबाही   भूख    देते हैं ,   
जिन्हें हमने मुकद्दर का ,  हर एक       आगाज़  सौंपा था |

उठो उठ     कर लगा     दो आग,  इनके      आशियाने को |
इन्हें अपनी तरह      कर दो ,     गिरा दो हर ठिकाने को |
तड़पने    दो     इन्हें      भूखा,     तभी ये    दर्द     समझेंगे ,
तुम्हारा अंश इसमें     hai  ,  मंगाओ स्विस खजाने को |

उसे दो तख्त दिल्ली का ,      समझता दर्द सबका हो |
जो हिंदी          और हिदुस्तान को अपना समझता हो |
समझता  हो जो बिच्छू - सांप सा,     पैसा हो   सरकारी ,
विचारों से जो भारत का ,  सही अर्थों    में अपना हो |

यही हो बस विकल्प अपना, यही बस `राज`  सपना  हो |
वही     neta     बनेगा     अब ,  हितैषी आम जन का हो |
हम अपने वोट की ताकत ,  अब इनको ही दिखायेंगे,
हटा कठपुतलियाँ,     अब हम उसे लायें जो सबका हो |
                              
                                              - धन वर्षा ,हनुमान मन्दिर,
                                         खटीमा- २६२३०८ ( उत्तराखंड)

सोमवार, 13 जून 2011

ramdev bnam mnmohn-2

जब तक हम सरकार हैं, नहीं लायेंगे  नोट |
हम हैं पक्के     बेशर्म, कितनी      मारो  चोट  |
कितनी मारो चोट, नई नित हांके       जाएँ,
`सांप्रदायिकहिन्दूकार्ड`,नए नित खेले जाएँ |
कहे`राज कविराय`,    चुना   तो कष्ट उठाओ , 
हम खाते हैं मॉल , मियां तुम लातें खाओ |


कठपुतली पी एम् रखा, धागे रख कर हाथ |
पीएम्ओ में चल रहा, दस जनपथ  का साथ |
दस जनपथ का साथ, दुष्टता  की हद कर दी ,
राष्ट्र शत्रु की तरह चढाई, जन पर      कर दी |
कहे `राज कविराय`, राष्ट्रहित रख कर    आगे,
राष्ट्रप्रेम रख प्रथम, तोड़ पी एम् सब      तागे |

                              हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

ramdev bnam mnmohn

                       राम देव बनाम मनमोहन
                                            - राज सक्सेना
जनपथ ने भरदी हवा, मनमोहन हो क्रुद्ध |
दिग्गी मुख ले लड़ रहे राम देव से युद्ध |
राम देव से युद्ध , पुलिसिया लट्ठ बजाते,
कर कायर का काम, नीचता उचित बताते |
कहे`राज कविराय`, अरे डायर    के     नाती,
पुलिसकमिश्नर गुप्ता तुझको शर्म न आती |

भ्रष्टों की सरकार क्यों,      लाये   काले  नोट |
राष्ट्र कर्म में लग रहा,  दुष्ट जनों को खोट |
दुष्टजनों को खोट,   बहाने    नित्य     बनाते |
सुप्रीमकोर्ट के हुक्मों को भी धता    बताते |
कहे`राज कविराय`, मॉल सब जो भी खाया,
कैसे वापस लायं, इन्ही ने जमा       कराया |

शुक्रवार, 10 जून 2011

mhapran nirala

                 महाप्राण निराला 
                                           -राज सक्सेना 

थे `समरेखा` से सरल हृदय,वक्री स्वभाव के नायक तुम |
लय से कविता में प्राण फूंक, थे जन-कविता के गायक तुम |
व्यक्तित्व अलग था कविता का, जो मेल कहीं पर खा न सका,
कविता में क्रांति मशाल लिए, थे नवकविता सम्वाहक तुम,


समझा अछूत तुमने कंचन, परित्याग निराला था तेरा |
जो जैसा था रखना सम्मुख, सम्भाग निराला  था   तेरा |
स्वान्त: सुखाय लेखन तेरा, जन-जन का लेखन बना सदा,
हर विधा अतुल थी जीवन की, हर भाग निराला था तेरा |


व्यक्तित्व निराला सूर्यकान्त, कविता का रूप निराला था |
सपने रच कर विक्रय न किये, तू स्वयमसिद्ध मतवाला था |
मदमस्त रहा हाथी जैसा, विचलन पथ से अपने न किया,
हे महाकवि, साहित्य-रथी,एक युग तूने रच डाला था  |


जब तूने वर्षागीत लिखा, आया बसंत में भी अषाढ़ |
हर विरहगीत में भर कर करुणा, पिघलाए कितने ही पहाड़ |
तुम हंसे-हंसी जनता सारी, रोए तो जनता रोती थी ,
हे महाश्रेष्ठ ,जनता के कवि, तुम कवियों में थे महाप्राण |
                                 -धनवर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

inayat ho rhi hai

                इनायत हो रही है
                                    - राज सक्सेना

गरीबों पर इनायत हो रही है |
भिखारी  सी सखावत हो रही है |
लूट कर टेक्स हम गरीबों से,
पडौसी की, समाअत हो रही है |
गरीबों को सडक पर छोड़ मरने,
मुफ्तखोरों की हिफाजत हो रही है |
हमीं को कह रहे कातिल, चला गोली,
खुली बेहद, सखाफत हो रही है |
थमा कर हाथ में दोनों के खंजर,
खुली बन्दर वकालत हो रही है |
दिया है हाथ में गैरों के आंचल,
सगी माँ की, तिजारत हो रही है |
जरा सी हिल गयी कुर्सी तो चीखे,
विरोधी  की शरारत हो रही है | 
मलामत हो रही है`राज` फिर भी,
नही क्यूँ अब, बगावत हो रही है |  

-          dhnvrsha ,  hnuman mndir,
       khtima-262308
      moba-09410718777
skhavt-danshiulta,inayt-kripa,smaat-
sunvai,hifajt-rksha ,skhaft-kminapn,
tizart-vyapar,shrart-shaitani,mlamat-
ninda,bgavt-vidroh 





गुरुवार, 9 जून 2011

log kyon

                      लोग क्यों ?
                               - राज सक्सेना
डाल कर थोड़ी गले में, लडखडाते लोग क्यों ?
बेखुदी अपनी दिखा कर. बड़बड़ाते  लोग क्यों ?
दोस्ती बरसों-बरस की पल में कर देते हैं तर्क,
दुश्मनी को आखिरत तक, भी निभाते लोग क्यों ?
लाख    तदवीरें    लगाते, हों  मुसीबत में अगर ,
दूसरे पर हो मुसीबत , खिलखिलाते लोग क्यों ?
हैं मियां -बीबी मगर हैं, एक छत में अजनबी ,
बोझ सा सर पर लिए, रिश्ते निभाते लोग क्यों ?
क्या कमी है गाँव में जो, भागते शहरों-शहर ,
बाद में शहरी फिजा में, कसमसाते लोग क्यों ?
अक्ल-ए-कुल हैं, फितरती, शातिर बड़े,मक्कार भी,
तिकडमों के बल पे ऐसे, जीत जाते लोग क्यों ?
`राज` खुद लेकर मुसीबत,डाल कर उसको गले,
बिन  लड़े ही बुजदिली से, भाग जाते लोग क्यों ?
         

                  धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-262308

fiza suhani likh

                 फिजा सुहानी   लिख              
                                                           - राज सक्सेना 

देशभक्त उठ कर भारत की, सही कहानी लिख |
कथा वीरता-परम्परा जो , रही   पुरानी  लिख |
अर्जुन बन गांडीव हाथ ले,रणभूमि में चलकर,
भ्रष्टों को कर नष्ट देश में,   फिजा सुहानी लिख |
दुश्मन की छाती चढ़ कर ही, दुश्मन टूट सकेगा,
मातृभूमि चरणों में बढ़ कर, निज कुर्बानी लिख |
भ्रष्टसोच ने अबतक अपना, जर्जर मुल्क किया है,
भ्रष्टाचारी  सोच  देश से,  करना   फानी    लिख |
मुल्क के दुश्मन गद्दारों ने,किया मुल्क में जो भी,
निर्भय होकर अब इन सब की, हर शैतानी लिख |
समझ रहा कायरता दुश्मन, सहनशक्ति हमसब की,
घर में घुसकर शौर्य शक्ति अब, वहीं दिखानी लिख |
बूढ़े - कापुरुष     हाथ    में ,   सत्ता  चली गयी है,
`राज` हाथ अब सत्ता लेगी,  नई   जवानी   लिख |

                   - धनवर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-262308

badhai hai

                   बधाई है
                                - राज सक्सेना

वो आये हैं तो रंग-ओ-नूर की बारात आई है |
हुआ रौशन जहाँ सारा, ख़ुशी भी साथ आई है |
नहीं पड़ते हमारे पांव, धरती पर जहाँ वालो,
यहाँ उनकी फ़कत आमद, हमारी आशनाई है |
ये लम्हे जो हमारे साथ गुजरेंगे यहाँ उनके,
धरोहरकीमती ज्यों चलकर, यहाँ नौशाद आई है |
जगमग है जहाँ सारा, हुआ माहौल गरिमामय,
ये उनकी शख्शियत है जो,यहाँ दिलशाद आई है |
चुकाएं कर्ज़ ये कैसे, कदम उनके यहाँ आये,
बिना मौसम अभी सबने, यूँ दीवाली मनाई है |
हमें विश्वास इतना है, रहेगा प्यार हम पर ये,
नमन है`राज` हमसबका, हृदयगत हर बधाई है |

                        - हनुमान मन्दिर, खटीमा- 262308

बुधवार, 8 जून 2011

thik ye aadt kro

                 ठीक ये आदत करो 
                                  - राज सक्सेना 

खा रहे हो दीमकों सा, ठीक ये आदत करो |
देश का कैसे भला हो, मन से ये चाहत करो |
कर चुके नुकसान जितना,रोक दो बस करो |
रहनुमाए मुल्क अपनी,  बंद ये हरकत करो |
वोट से तोलो नहीं अब, तुम किसी की जान को,
जिस तरह भी हो सके  , अब बंद ये लानत करो |
दूसरों  पर   कब  तलक  डालोगे  अपनी तोहमतें   ,
झांक  कर खुद  का गिरेबां, बंद ये आफत करो |
देश हित में एक भी, गद्दार को पालो न तुम,
इस बुरी आदत को छोडो, मुल्क पर रहमत करो |
मॉल-ओ-जर कुछ भी नहीं, कौम भी कुछ चीज़ है,
अपने आमालों से इसकी, और मत शामत करो |
मुल्क की दौलत उड़ाते ही रहे तुम बेवजह,
मुल्क के किरदार पर भी खर्च ये नेमत करो |
सब बदल जायेगा अपने आप, बस इतना करो ,
`राज` उठ कर सिर्फ अपनी,  ठीक ये नीयत करो |



inkilab kar dalo

इन्किलाब कर डालो
                           - राज सक्सेना

उट्ठो-उट्ठो इन्किलाब कर डालो.
उनका खाना       खराब कर   डालो |
एक    मछली  से  घुस  गये हो जब,   
पूर्ण   गंदा   तलाब    कर         डालो |
इतना ऊधम      मचाओ संसद  में,
साँस लेना    अजाब    कर       डालो |
बेतुके    प्रश्न     चीख   कर       पूछो,
सबको तुम लाजवाब   कर    डालो |
रिश्वतें    सब   विदेश   ले      जाकर ,
बैंक  में निल  हिसाब   कर    डालो |
कमाओ खूब, खत्म हो न   कभी,
खुद को वाजिद नवाब कर डालो |
उट्ठे खिलाफ कोई, हौंसला न रहे,
इतना सब पर दवाब कर डालो |
दर्द-इ-सर हो      गया अगर कोई,
उसकी पुश्तें      खराब कर डालो |
कच्ची        दारू को देके संरक्षण,
सब का जीवन `गुलाब` कर डालो |
इतने संशोधन हों कोंस्टीट्यूशन  में,
लंगड़ी-लूली        किताब कर डालो |
मुल्क है `राज` फिर बिके न बिके ,
जल्दी     सौदा,   जनाब    कर डालो |
                - धनवर्षा, हनुमान मन्दिर ,
             खटीमा-262308(उत्तराखंड)
  मो- 09410718777

मंगलवार, 7 जून 2011

rn men utre ab ramdev

                   रण में उतरे अब रामदेव 
                                                                    -  डा ० राज सक्सेना 
इंडिया बने  भारत   स्वदेश,
हों दूर धरा के सकल क्लेश |
एक लाल जना भारत माँ ने,
ले सन्यासी का नवल वेश |

उठ स्वामी ने   भ्रकुटी  फेरी,
बज गयी समर की रणभेरी |
आक्रामक योग दिखेगा अब,
नभ योग पताका फिर फहरी |

जागा भारत का स्वाभिमान,
सब अधिकारों   को गये जान |
हर मन में योग  मशाल जली, 
हो गये सजग निज भ्रकुटी तान |

जो सिखा   रहे    थे बैर    यहाँ,
फिरकापरस्त  की खैर    कहाँ |
जितना करना  कर चुके भ्रष्ट ,
बाँधो बिस्तर अब   जाओ जहाँ |

बाबा  की  दृष्टि  पड़ी  तुम  पर ,
भग जाओ यहाँ से बच-बच कर |
जो   कमा  चुके  वो रखो   यहाँ,
बस दो कपड़े रख  लो तन   पर |

भारत   माँ   के   सच्चे    सपूत ,
निर्धन   जनता    के      देवदूत |
 ले कर    पतंजलि योग-ज्योति ,
आये बन कर तुम      क्रांतिदूत |

जन-जन के बन कर सत्यमेव ,
हो   शत्रु ,   भ्रष्ट    के    एकमेव |
सम्पूर्ण    राष्ट्र    की  पीड़ा    ले ,
रण  में   उतरे ,  अब  राम  देव |

        धनवर्षा,हनुमान मन्दिर ,
             खटीमा- 262308

सोमवार, 6 जून 2011

sahara kam nahin hota

मिले तिनका भंवर में तो, सहारा कम नहीं होता |
अगर संघर्ष खुदसे  हो,   किनारा  कम  नहीं होता |
कोई बहता परेशां  जा रहा हो मौज - ए- दरिया में,
उसे  उस वक्त उँगली को, थमाना कम नहीं  होता|
खड़ा एक पेड़ सहरा में, बहिश्ती  लगने लगता  है,
किसी हैरां मुसाफिर को, ये साया  कम नहीं होता |
सदी तक बीत जाती है, किसी का जीतने में दिल ,
तआल्लुक-तर्क- करने को,जमाना कम नहीं होता |
बढाओ प्यास अपनी तो, समन्दर बूंद से कम है,
मिटाने तिशनगी सोचो तो, कतरा कम नहीं होता |
फिराक-ए-रौशनी  में `राज`,भटके जो अंधेरों में,
अगर एक राह हासिल हो, सितारा कम नहीं होता |
                                                 

                                          राज सक्सेना,
                             धनवर्षा ,हनुमान मन्दिर
              
                           खटीमा- २६२३०८ (उत्तराखंड)
                            मो- 09410718777

शुक्रवार, 3 जून 2011

pndrh agst

           पन्द्रह अगस्त  
                                               -राज सक्सेना 

भारत का जिस दिन उगा सूर्य,
और ब्रिटिशराज हो गया  अस्त |
भारत का   भाग्य-विधाता दिन,
है स्वर्णदिवस, पन्द्रह   अगस्त |

तोड़ी   जंजीर    गुलामी      की,
सर   आज़ादी  का   ताज  सजा |
इस दिन भारत में प्रथम  बार,
आज़ाद - फौज का बिगुल बजा |

आधी दुनिया का प्रखर    सूर्य,
पल  भर में  ही हो   गया अस्त |
|भारत का   भाग्य-विधाता दिन,
है स्वर्णदिवस, पन्द्रह   अगस्त 

लेकर   भागे    जो   पड़ा  हाथ,
जो  हमको  नित्य  सताते  थे |
बिन बात बिना   गलती के भी,
जो हमको नित्य   सताते   थे |

जब  चढ़ा  तिरंगा ,  फहराने ,
बंधन से  सब कुछ हुआ  मुक्त |
भारत का   भाग्य-विधाता दिन,
है स्वर्णदिवस, पन्द्रह   अगस्त |

गाँधी ने जग में  , नाम     किया,
बिन  लड़े ,  युद्ध में     जीत हुई |
हो   गयी  अहिंसा   सर्व- मान्य,
हर घड़ी    दुखों   की  बीत  गयी |

वह  शासन  , पार समुद्र   गया,
जिससे जनता थी बहुत   त्रस्त |
 भारत का   भाग्य-विधाता दिन,
है स्वर्णदिवस, पन्द्रह   अगस्त |

शासक, शासित सब   अपने   थे,
जिनको    सत्ता    में    आना  था |
जनता से प्रतिनिधि को चुनकर,
जनता का राज    चलाना      था |

जन गण बंधन    से  मुक्त  हुआ,
और ब्रिटिश  शौर्य हो गया अस्त |
भारत का   भाग्य-विधाता दिन,
है स्वर्णदिवस, पन्द्रह   अगस्त |

अब    बारी    अपनी   है   मित्रों,
भारत  को   स्वर्ग    बनाना  है |
हर खेत  मिले  जमकर   पानी,
हर  हाथ  काम   दिलवाना   है |

सबसे निर्धन, मजदूर,  कृषक,
इनको करना   है   कष्ट- मुक्त  |
भारत का   भाग्य-विधाता दिन,
है स्वर्णदिवस, पन्द्रह   अगस्त |

       -धनवर्षा , हनुमान मन्दिर,
      खटीमा-२६२३०८(उत्तराखंड)
      मो-  09410718777



                                                 

गुरुवार, 2 जून 2011

bhart ki ekta ka shbd hai hindi

           उर्दू गजल का हिंदी अनुवाद 

भारत की एकता का, शब्द है हिंदी |
भाषा सभी की है यही, मित्र है हिंदी |
विश्व में इससे मिष्ट कोई बोली नहीं है,
प्रत्येक हृदय में,गूंजता स्वर है हिंदी |
कोना नहीं है शेष, जहाँ चलती न हो,
स्वप्नों की उन्नति की उड़ान है हिंदी |
उठ कर चली तो फिर कभी पीछे न देखा,
दुनिया की हर भाषा की मुकुट है हिंदी
भाषा के गहनों से भरपूर देश फिर भी,
गहनों में सर्व मान्य है सर्वश्रेष्ठ है हिंदी |
 चन्द्रमा सी हृदयग्राह्य है तारों सी मोतिया,
सबसे अलग स्थान की, शैली है हिंदी |
बहनों की तरह देश में रहती हैं भाषाएँ,
सर पे सजा सबके वही, मुकुट है हिंदी |
हिंदी के सम्मान में, कहने को बहुत है,
प्रत्येक हृदय की प्रिय भाषा`राज`है हिंदी |
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बुधवार, 1 जून 2011

chnd ashaar

               चंद अशआर

करेंगे कुछ हंसीं बातें,  सुनेंगे खुशनुमा नगमे |
चलो आगाज़ करते हैं, सुहानी शाम का यारो  |

ये महफिल है शरीफों की, शरीफों की तरह रहिये|
अगर कोई शिकायत है, अदब के साथ कुछ कहिये|

मत उलझ हम से अमीरे कारवां, ये सोच ले |
जिन्दगी हम से उलझ कर, चैन से अब तक नहीं |

खामियां मुझ में जो हैं, रहती रहें तो ठीक हैं |
मैं  मुकम्मल हो गया तो, देवता हो जाऊंगा |

मेरे गीतों से सियासत, दूर रख मेरे रकीब |
फूल से नाज़ुक बदन हैं, धूप में मुरझाएंगे |

                बच्चा

आँख से जब एक बच्चे की, जो टपकी बूंद तो |
कुछ दिनों अंगार के बिस्तर पे सोना पड़ गया |

किसी निर्धन के बच्चे की, कभी आँखों में झांकोगे,
किसी शाला के सपनों से, सजी होंगी बुझी आँखें |

सियासत में धकेलो मत, अभी मासूम हैं बच्चे |
सियासत की कलाबाज़ी, इन्हें बर्बाद कर देगी |

मंहगी किताब फ़ीस ने मायूस कर दिया |
निर्धन कोई शाला गया, वापस निकल गया |

बड़े हैं उम्र से अपनी हमारी दौर के बच्चे |
हमीं कम उम्र में इनको, बड़ा बनना सिखाते हैं |

              बुज़ुर्ग

बूढ़ा हुआ जो बाप तो ,     बोझा हुआ बहुत  |
बच्चों ने उसको सहन के, कोने में रख दिया |

पैरों पे क्या खड़े हुए, बच्चे अलग हैं `राज` |
ये भूल कर के बाप है, कंधे  की आस में |

बरगद की तरह छाया, जिसकी वो समझते थे |
हर शाख लगे उलझन, सूखे हुए शजर की |

इस दौरे तरक्की में, ऊंचाई से गिरने पर,
बढ़ कर जो सहारा दे, दामन नहीं मिलता |

पीढ़ी नई हमेशा, चढ़ता हुआ सूरज है ,
पर डूबते सूरज की, हर शान निराली थी |

ये शजर फलदार न हो, धूप से साया तो है,
इसकी एक-एक शाख में, मां का है आंचल  छुपा |

हिंदी की कहानी में, उर्दू के भी किस्से को,
एक साथ मिला दें तो, इतिहास बदल जाये |

१८-
घड़ी-घड़ी हो आरती, क्षण-क्षण चढ़ें प्रसून,
बौने सिंहासन चढ़े,  दिल्ली,  मुम्बई,    दून |

जग भर में उपलब्ध सब, मन में करें विचार |
बौने मिल कर   कर   रहे ,  संविधान  तैयार  |

किसी देश का हो गया , यदि   बौना    संघर्ष |
कैसे सम्भव हो सके,    समयबद्ध    उत्कर्ष |

बौनापन पर्याय है,राजनीति   का        आज |
जनहित के विपरीत ही, होते हैं जन-  काज |

कुछ बौनों ने कर दिया, जब बौना साहित्य |
विदा तभी से हो गया, भाषा का   लालित्य |  

हिंदी अब हिंगलिश बने, बौने करें प्रयास |
रोमन में हिंदी लिखें, बिना व्याकरण खास |

हिंदी कौशल्या बनी, इंग्लिश कैकेयी रूप |
बौने दशरथ रच रहे, नये-नये अति-रूप |

बौनों के साहित्य के, बौने बनें प्रधान |
हिंदी के उत्कर्ष का, है नाटक  श्रीमान |

हिंदी हाथी सी बनी, बौनों का संग छोड़ |
दुनिया भर में छा गयी, मंथर गति से दौड़ |
                      धनवर्षा, हनुमान मन्दिर,
                      खटीमा-262308
                         मो-